ब्रिक्स का विस्तार होने के बाद यह समूह अब दुनिया की बड़ी आबादी और एक बड़े हिस्से की अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। भारत की अध्यक्षता में हो रहा यह सम्मेलन इस लिहाज़ से अहम है कि नई दिल्ली खुद को वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में पेश करती रही है।
भारत के सामने अवसर
- विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को वैश्विक एजेंडे में जगह दिलाना
- डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के भारतीय मॉडल को साझा करना
- व्यापार और निवेश के नए गलियारे खोलना
और चुनौतियां भी
विस्तारित समूह में सदस्य देशों के आर्थिक और रणनीतिक हित अलग-अलग हैं। ऊर्जा, प्रतिबंधों और मुद्रा जैसे मुद्दों पर सबको एक पन्ने पर लाना आसान नहीं होता। भारत को यह संतुलन भी साधना है कि ब्रिक्स किसी खेमे का मंच न दिखे।
जानकारों का कहना है कि इस सम्मेलन की सफलता घोषणापत्र की भाषा से नहीं, बल्कि उसके बाद ज़मीन पर उतरने वाली ठोस परियोजनाओं से आंकी जाएगी।