मुख्यमंत्री गोवध को लेकर करें आत्मचिंतन : स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद

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वाराणसी{ गहरी खोज }: ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उत्तर प्रदेश सरकार पर गोवध और मांस उत्पादन को लेकर साेमवार काे गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को इस विषय पर आत्मचिंतन करना चाहिए। शंकराचार्य ने बढ़ते मांस उत्पादन, वधशालाओं को मिल रहे सरकारी संरक्षण और नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए।
केदारघाट स्थित श्री विद्यामठ में शंकराचार्य ने बताया कि 40 दिवसीय ‘उत्तर प्रदेश राज्यमाता अभियान’ का यह 11वां दिन है। उन्होंने कहा कि विगत माघ मेले के दौरान मुख्यमंत्री के नेतृत्व में उनसे 24 घंटे में शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगा गया था, जिसे उन्होंने समयसीमा के भीतर प्रस्तुत कर दिया। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री को ‘असली हिन्दू’ होने का प्रमाण देने के लिए 40 दिन का समय दिया था, जिसमें से अब तक 10 दिन बीत चुके हैं।
शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि इन 10 दिनों में सरकार या मुख्यमंत्री की ओर से ‘असली हिन्दू’ होने का कोई प्रमाण नहीं दिया गया, बल्कि उनके आचरण से इसके विपरीत संकेत मिले हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश के पशुपालन मंत्री के माध्यम से यह स्वीकार किया गया कि सरकार गाय नहीं, बल्कि भैंस, बकरा और सुअर का वध करवा रही है, जो हिन्दू परंपराओं के विरुद्ध है।
उन्होंने केंद्रीय बजट 2026 का हवाला देते हुए कहा कि जीव हिंसा को बढ़ावा देने वाले इस बजट का प्रदेश सरकार द्वारा स्वागत किया गया, जबकि इसमें मांस निर्यातकों को तीन प्रतिशत अतिरिक्त ड्यूटी-फ्री छूट दी गई है। यह दर्शाता है कि शासन की प्राथमिकता धर्म नहीं, बल्कि आर्थिक लाभ है।
शंकराचार्य ने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि वर्ष 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले उत्तर प्रदेश में मांस उत्पादन लगभग 7.5 लाख टन था, जो वर्तमान में बढ़कर 13 लाख टन से अधिक हो गया है। उन्होंने दावा किया कि वधशालाओं की संख्या कागजों में भले कम दिखाई देती हो, लेकिन पशु वध की मात्रा और गति में लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व में जिन्हें अपराध माना जाता था, उन्हें अब उद्योग का दर्जा देकर 35 प्रतिशत तक की सब्सिडी (पांच करोड़ रुपये तक) दी जा रही है।
शंकराचार्य के अनुसार, मुख्यमंत्री के पिछले नौ वर्षों के कार्यकाल में प्रदेश में अनुमानित 16 करोड़ से अधिक निरपराध पशुओं, जिनमें लगभग चार करोड़ भैंसवंश शामिल हैं, का वध हुआ है। उन्होंने सवाल किया कि क्या इन पशुओं की पीड़ा एक ‘योगी’ के कानों तक नहीं पहुंचती।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि किसानों की बदहाली के बावजूद मांस निर्यातक कंपनियों से चुनावी चंदा लेकर उन्हें सरकारी संरक्षण दिया जा रहा है। उन्होंने गुजरात के विधायक अमित शाह (एलिसब्रिज) द्वारा 32 करोड़ रुपये के बूचड़खाना बजट को वापस कराए जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि इच्छाशक्ति हो तो बदलाव संभव है।
शंकराचार्य ने कहा कि मुख्यमंत्री उसी राजकोष से वेतन और सुविधाएं लेते हैं, जिसमें कसाईखानों से प्राप्त राजस्व भी शामिल है। ऐसे में एक महंत और एक धर्मनिरपेक्ष मुख्यमंत्री की दो विरोधी शपथों के बीच फंसा व्यक्ति धर्म-रक्षा कैसे करेगा, यह बड़ा प्रश्न है।
उन्होंने अभियान की आगामी रूपरेखा बताते हुए कहा कि 19 फरवरी को देशभर में स्वतंत्र विमर्श आयोजित किया जाएगा। एक मार्च को काशी में ‘अखिल भारतीय संत एवं विद्वद्गोष्ठी’ के माध्यम से ‘वेतन और वैराग्य’ विषय पर शास्त्रार्थ होगा, जबकि 11 मार्च को लखनऊ में अभियान का अंतिम निष्कर्ष और आगामी ‘धर्म-शासनादेश’ जारी किया जाएगा। शंकराचार्य ने उम्मीद जताई कि शेष 30 दिनों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आत्मचिंतन करेंगे और गोमाता को ‘राज्यमाता’ घोषित कर इस क्रूर व्यापार को बंद करने की दिशा में कदम उठाएंगे।

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