
सूरत के बलेठी गाँव का अनोखा मॉडल बना मिसाल, 162 बायोगैस प्लांट और 4 चेकडैम से बदली तस्वीर; 5 साल में 7,500 लोगों को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य
गांधीनगर, 19 अक्टूबर। गुजरात के सूरत जिले की मांडवी तहसील के आदिवासी गाँव बलेठी ने जंगल संरक्षण के क्षेत्र में एक अनूठी मिसाल पेश की है। वर्ष 1986 से 1988 के बीच लगातार तीन साल सूखा पड़ने से गाँव के आसपास के जंगल उजड़ गए थे। इसके बाद ग्रामीणों ने एकजुट होकर जंगलों की रक्षा और पुनर्विकास का अभियान शुरू किया, जो आज पूरे गुजरात के लिए प्रेरणा बन गया है।
162 बायोगैस प्लांट और 4 चेकडैम ने बदली तस्वीर
बलेठी गाँव में जंगलों की सुरक्षा के लिए 15 गश्ती दल बनाए गए। ग्रामीणों ने 162 बायोगैस प्लांट और 4 चेकडैम बनाकर जंगलों पर ईंधन और संसाधनों का दबाव कम करने की दिशा में काम किया। गाँव की सहकारी समिति ने 229 हेक्टेयर वन क्षेत्र के संरक्षण की जिम्मेदारी भी संभाली।
दूध उत्पादन बढ़ा, बाँस की बिक्री से लाखों की आय
इस पहल से गाँव की आजीविका को भी फायदा हुआ। दूध उत्पादन बढ़कर प्रतिमाह लगभग 12 से 13 हजार लीटर हो गया, जबकि चारे की उपज में सात गुना वृद्धि हुई। बाँस की बिक्री से 17.7 लाख रुपये से अधिक की आय हुई। उत्कृष्ट कार्य के लिए बलेठी को वर्ष 1998 में ‘इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था।
अब पूरे गुजरात को सिखाया जाएगा बलेठी मॉडल
गाँव के ऐतिहासिक विद्यालय भवन को ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ के रूप में विकसित करने की पहल की गई है। इसके माध्यम से अगले पाँच वर्षों में गुजरात की 2,500 संयुक्त वन प्रबंधन समितियों के लगभग 7,500 सदस्यों को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य है। बलेठी मॉडल से मांडवी तहसील के 65 से अधिक गाँव भी प्रेरित हुए हैं।
बलेठी की सफलता बताती है कि जनभागीदारी से जंगल भी बचाए जा सकते हैं और गाँव की अर्थव्यवस्था भी मजबूत की जा सकती है।
