युध्द कोई जीता नहीं, नुकसान सबका हुआ…

0
20260616171228_masoud pezeshkian donald trump

सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }:
वह जमाना गया जब दो देशों के बीच युध्द हो तो युध्द में एक देश जीतता था और एक देश हारता था।एक खुद को विजयी मानता था और दूसरा खुद को पराजित स्वीकार करता था। पराजित देश को विजयी देश की कई शर्तें माननी पड़ती थी। २०२१ के दशक में युध्द का स्वरूप बदल गया है। इसका पता रूस-यूक्रेन व अमरीका-ईरान युध्द से चलता है।अब दो देशों के बीच युध्द शुरू हुआ तो वह कब समाप्त होगा कोई यह बता नहीं सकता। रूस-यूक्रेन युध्द कई साल से चल रहे हैं और दोनो देश चाहें तो कई साल तक चल सकते हैं क्योंकि युध्द अब मैदान में नहीं लड़े जाते हैं,जो युध्द मैदान में लड़े जाते थे,उसमें कुछ दिनों या कुछ महीनों में हार जीत का फैसला हो जाता था। अब तो ड्रोन व मिसाइलों से युध्द लड़े जाते हैं। एक दिन एक देश हमला करता है, एक दिन दूसरा देश हमला करता है। हमले होते रहते हैं, एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने का दावा किया जाता है लेकिन हार जीत नहीं होती है।अमरीका व ईरान युध्द में भी ऐसा ही हुआ है।कोई जीता नहीं है और कोई हारा नहीं है। दोनों लड़ते लड़ते थक गए थे इसलिए शांति चाहते थे लेकिन अपनी शर्तों पर शांति चाहते थे। यही वजह है कि शांति की कोशिशें होती रही हैं लेकिन रिजल्ट नहीं निकल रहा है। शांति के लिए बातचीत होती रही और इसका परिणाम अब जाकर शांति के रूप में आया है।

ईरान व अमरीका के बीच आखिर १०७ दिन के बाद लड़ाई बंद हो गई है।१५ जून को अमरीका व ईरान ने डील के एमओयू पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। जिनेवा में १९ जून को औपचारिक हस्ताक्षर वाला कार्यक्रम होगा।शांति के लिए शुरुआत हो गई है।अभी कई बिंदुओं पर दोनों पक्षों के बीच ६० दिन तक बातचीत होगी। उसके बाद जो समझौता होगा वह अंतिम समझौता होगा।दोनों देशों के बीच युध्द खत्म होने तथा शांति समझौते का पूरी दुनिया इंतजार कर रही थी। दोनों देशों के बीच युध्द के कारण पूरी दुनिया में तेल व ईंधन के दाम बढ़ गए हैं और सब इंतजार कर रहे थे कि युध्द समाप्त हो तो सभी देशों को महंगाई से राहत मिले।दोनों देशों के बीच युध्द समाप्त होने का सभी देशों ने स्वागत किया है। सब चाहते थे कि दोनो देशों के बीच जो भी समस्या है, उसका हल बातचीत के जरिए निकाला जाए क्योंकि सब मानते हैं युद्ध से किसी समस्या का हल नहीं होता है सिर्फ नुकसान होता है. लड़ने वाले देशों का भी नुकसान होता है और बाकी देशों का भी नुकसान होता है।

दोनों देशों के बीच आखिर युध्द समाप्त हुआ तो बातचीत के जरिए ही हुआ। बातचीत का यह सिलसिला युध्द शुरू होने के बाद ही शुरू कर दिया गया होता 100 दिन तक पूरी दुनिया को जो परेशानी हुई है नहीं हुई होती। अमरीका को वहम था कि वह कुछ दिन में युध्द समाप्त कर ईरान को घुटनों पर ले आएगा लेकिन १०० दिन बाद भी अमरीका ईरान को घुटनों पर नही ला सका, उसे खुद ईरान का शर्ते माननी पड़ी जो वह सामान्य स्थिति में कभी नही मानता क्योंकि युध्द से ट्रंप को अमरीका की अंदरूनी राजनीति में नुकसान हो रहा था और आने वाले दिनों में और ज्यादा राजनीतिक नुकसान होता इसलिए ट्रंप जल्द युध्द समाप्त करना चाहते थे, ऐसा तब ही होता जब ट्रंप ईरान की शर्ते मानते। हार जीत की कसौटी पर इस युध्द को देखा जाए तो हार तो ट्रंप की हुई है क्योंकि वह सबसे शक्तिशाली देश है लेकिन उसे ईरान की कुछ बातें माननी पड़ी है, इसे ईरान की जीत व अमरीका की हार माना जा सकता है। अमरीका ईरान में जो करना चाहता था वह 100 दिन में नहीं कर सका है और ईरान जो चाहता था वह सौ दिन में हासिल करने में सफल रहा है।

डील के १४ पाइंट को देखने पर साफ हो जाता है कि ईरान ने अमरीका का झुकने पर मजबूर कर दिया है। डील के मुताबिक ईरान,लेबनान व अन्य मोर्चों पर युध्द बंद होगा,अमरीका ईरान की संप्रभुता व आतंरिक मामले में कोई दखल नहीं देगा, ३० दिन मे अमरीकी नाकाबंदी खत्म होगी,ईरानी क्षेत्र से अमरीकी सेना हटेगी,३० दिन में होर्मूज को खोला जाएगा,ईरानी तेल,पेट्रो केमिकल से प्रतिबंध हटाया जाएगा,ईरान को निर्यात का पूरा अधिकार होगा,अमरीका व उसके सहयोगी ईरान के पुनर्निर्माण के लिए २८ लाख करो़ड़ रुपए का पैकेज देंगे।परमाणु मुद्दे और ईरान पर से प्रतिबंध हटाने के लिए६० दिन बात होगी,एनएनपीटी के तहत ईरान परमाणु बम नहीं बनान का लिखित में आश्वासन देगा,वार्ता अवधि मे अमरीका सेना का जमाव नहीं करेगा न ही नए प्रतिबंध लगाएगा, वार्ता की शुरुआत में ही अमरीका ईरान की करीब १.२५ लाख करोड़ की संपत्ति को डीफ्रीज करेगा,वार्ता की शर्ते लागू करने के लिए समिति का गठन किया जाएगा,संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद फाइनल एग्रीमेंट की घोषणा करेगा।अमरीकी यह शर्ते पहले भी मान सकता था लेकिन वह ईरान को हराना चाहता था और वह यही नहीं कर सका इसलिए बाद में उसे वह शर्ते माननी पड़ी है।

शांति के लिए प्रयास शुरू हो गए हैं ऐसा नहीं है कि दोनों देशों के बीच शांति का यह कोई पहला प्रयास है, इससे पहले भी कई प्रयास हो चुके हैं लेकिन कभी अमरीका तो कभी ईरान के अड़ने के कारण सफल नहीं हुए। अभी जो प्रयास है, इसमेे कई पेंच ऐसे है जिस पर दोनों देशों के बीच विवाद हो सकता है, बात हो सकती है। कभी ट्रंप कुछ कह सकते हैं,कभी ईरान की तरफ से कुछ कहा जा सकता है। इसके अलावा इजराइल ने साफ कर दिया है कि शांति की जो बाते हो रही हैं वह ईरान व अमरीका के बीच हो रही है. इसे मानने के लिए इजराइल मजबूर नहीं है यानी वह अभी कुछ दिन भले लेबनान में आतंकियों पर हमला न करे लेकिन भविष्य में भी नहीं करेगा ऐसा नही माना जा सकता। अमरीका भले अपने लक्ष्य को हासिल किए युध्द मैदान से हट सकता है लेकिन इजराइल का साफ कहना है कि उसका लक्ष्य लेबनान से आतंकियों का सफाया है। वह इस काम मे लगे रहेगा चाहे अमरीका उसका सहयोग करे या न करे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *