आईबीसी ने भारत में बदली दिवालिया कंपनियों की दशा, एसेट वैल्यू रिकवरी को मिला बढ़ावा: पीएचडीसीसीआई उपाध्यक्ष

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नई दिल्ली{ गहरी खोज }: दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) ने भारत में दिवालिया प्रक्रिया में गई कंपनियों का समाधान जल्द करने में बड़ी भूमिका निभाई है और इससे एसेट वैल्यू रिकवरी में सुधार देखने को मिला है। यह जानकारी पीएचडी चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) के उपाध्यक्ष संजय सिंघानिया की ओर से रविवार को दी गई।
पीएचडीसीसीआई के एक कार्यक्रम में सिंघानिया ने कहा कि आईबीसी ने भारत में फेल हो चुकी कंपनियों के समाधान प्रक्रिया में आधारभूत बदलाव लाया है। पहले दिवालिया प्रक्रिया में गई कंपनियों के समाधान में काफी समय लगता था और इससे उनके एसेट की वैल्यू में भी भारी कमी आती थी। उन्होंने कहा, “आईबीसी ने तेज समाधान, बेहतर ऋण अनुशासन और निवेशकों के विश्वास पर ध्यान केंद्रित किया है।” हालांकि, उन्होंने संबोधन में और अधिक तेज समाधान, लचीलापन और मूल्य संरक्षण तथा व्यवसायों के पुनरुद्धार पर अधिक बल देने की आवश्यकता का जिक्र किया।
कार्यक्रम में हाल ही में पारित दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2026 पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें नीति निर्माताओं, कानूनी विशेषज्ञों, दिवालियापन पेशेवरों और उद्योग जगत के लीडर्स को भारत में विकसित हो रहे दिवालियापन ढांचे पर विचार-विमर्श करने के लिए एक साथ लाया गया।
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के पूर्व सदस्य (न्यायिक) न्यायमूर्ति राकेश कुमार जैन ने भारत में दिवालियापन कानूनों के विकास का विवरण प्रस्तुत किया और आईबीसी के तहत खंडित तंत्रों से एकीकृत, लेनदार-संचालित प्रणाली में परिवर्तन के बारे में बताया।
उन्होंने कहा,“2026 के संशोधन का उद्देश्य दिवालिया प्रक्रिय में लगने वाले समय को कम करना और लेनदारों का विश्वास बढ़ाना है।” राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के सदस्य (न्यायिक) अशोक कुमार भारद्वाज ने कहा कि उभरती आर्थिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए दिवालियापन कानून का निरंतर विकास होना आवश्यक है। उन्होंने दोहराया कि आईबीसी का मूल उद्देश्य केवल वसूली नहीं, बल्कि समाधान और मूल्य अधिकतमकरण होना चाहिए। इसके अलावा, नेशनल ई-गवर्नेंस सर्विसेज लिमिटेड (एनईएसएल) के प्रबंध निदेशक और सीईओ देबज्योति रे चौधरी ने पारदर्शिता बढ़ाने और चूक के प्रामाणिक रिकॉर्ड उपलब्ध कराकर देरी को कम करने में सूचना उपयोगिताओं के महत्व पर जोर दिया, जिससे विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को लाभ होता है।

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