इरविन खन्ना संपादकीय { गहरी खोज }: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले से शुरू की गई पूर्व मुस्लिम यात्रा हरिद्वार में हर की पैड़ी पर समाप्त हुई। पूर्व मुस्लिमों ने हर की पैड़ी के ब्रह्मकुंड में पहुंचकर गंगा को प्रणाम कर गंगा में स्नान कर अपना शुद्धिकरण किया। इस्लाम छोड़ हिन्दू धर्म अपनाने वाले इन लोगों ने इस घटना को घर वापसी कहा। भारत में विदेशी मिशनिरयों को छोड़ दें तो भारतीय मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू ही थे। समय और परिस्थितियों के दबाव के कारण उनके पूर्वजों ने इस्लाम कबूल कर लिया। इस बात को आज भी मुस्लिम समाज स्वीकार करता है और सत्य यह भी है कि वह अपनी बिरादरी के हिन्दू रिश्तेदारों के साथ आज भी संपर्क में है। मुस्लिम धर्म को छोड़कर अगर कोई स्वेच्छा से हिन्दू धर्म स्वीकार करता है तो यह घर वापसी ही है। हिन्दू समाज को समझना होगा कि स्वेच्छा से घर वापसी हिन्दुत्व में तभी होगी जब समाज में जात-बिरादरी की दीवार कमजोर होगी। जब समाज अपनी कुरीतियों विरुद्ध स्वयं जागरुक हो कार्य करेगा तब समय और परिस्थितियों के दबाव के कारण हिन्दू धर्म छोड़कर जाने वाले घर वापसी के लिए स्वयं तैयार हो जाएंगे, लेकिन ऐसा माहौल बनाने के लिए हिन्दू समाज को सामाजिक स्तर पर कदम उठाने होंगे। प्रत्येक हिन्दू और विशेषतः हर एक धर्म प्रचारक सामाजिक भेदभाव, ऊंच-नीच व छुआछूत मिटाने का संकल्प ले। जाति भेद की खाई हिन्दू धर्म शास्त्रों में जाति-भेदपरक श्लोकों की मिलावट के कारण है। जातिभेद हिन्दू धर्म का अंग नहीं है। अतः सभी हिन्दू धर्मग्रंथों से मिलावटी श्लोकों को निकाला जाए जैसा कि मनुस्मृति में से मिलावटी श्लोक निकाले गए हैं। हिन्दुओं के धर्मशास्त्र वेदों में एक शब्द की भी मिलावट न होने के कारण उन में कहीं भी जाति-भेद, छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई का उल्लेख नहीं है। अतः सभी हिन्दू वेदों की आज्ञाओं के अनुसार चलें, जाति-भेद को न माने और छुआछूत को मिटाएँ। हिन्दू धर्म ग्रंथों जैसे धर्मसूत्रों, स्मृतियों व अन्य कुछ ग्रंथों में मिलावट के कारण अनेकों वचन वेद के विरूद्ध होने के कारण, अप्रामाणिक, अमान्य एवं त्याज्य हैं। अतः हम इन वचनों की उपेक्षा करें तथा आपस में घृणा, द्वेष आदि न करें क्योंकि वेद ही हमारे प्रामाणिक धर्म शास्त्र हैं। • महाभारत (शा.प.अ. 188.10) के अनुसार ‘वर्णों में कोई विशेषता या भेद नहीं है क्योंकि सारी सृष्टि उसी परमेश्वर ने बनाई है।’ वस्तुतः पहले एक ही वर्ण था, बाद में चार वर्ण हो गए। (भ.मा. 1.60.5) हिन्दू धर्म में सभी मनुष्यों को एक ही मानव जाति का माना गया है। (मानुष्यश्चैक विधिः, सांख्य द. सांख्यकि 57) यानी ‘सब मनुष्य एक समान हैं।’ अतः जन्मना जाति व्यवस्था के आधार पर जातिभेद अमान्य है। इसलिए हम किसी से जात-पांत का भेद भाव न करें। सामाजिक व धार्मिक सामूहिक उत्सवों पर सबसे समानता के आधार पर मिलें, सहभोज करें एवं पारस्परिक भित्रता बढ़ावें। होली, दिवाली आदि के सामूहिक उत्सवों पर पारस्परिक मिलन, छुआछूत मिटाने का साधन रहा है। तो आज भी हम प्रत्येक दिन को ही सामूहिक उत्सव मानें और हर दिन छुआछूत मिटाएँ। अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दें जैसा कि शिक्षित व कामकाजी मध्यम वर्ग में इसका चलन बढ रहा है। हम समाज के गरीब, अशिक्षित व पिछड़े वर्ग के हिन्दुओं को हिन्दू धर्म शास्त्रानुसार समता और ममता के आदर्श पर गले लगाएँ और उन्हें सामाजिक सम्मान दें जैसा कि स्वामी विवेकानन्द ने कहा था ‘आदर्श रूप में एक तरफ ब्राह्मण (विद्वान तपस्वी) है और दूसरी तरफ घोर पतित व्यक्ति है और हमारा सारा काम उसे उठाकर ब्राह्मण बनाना है।’ (जाति, संस्कृति और समाजवाद पृ. 6) जाति सूचक नाम न लिखना भी जातिभेद कम करने का एक साधन है। नारायण गुरु कहते हैं ‘वास्तव में जाति का कोई अस्तित्व नहीं हैं। मैं कहता हूं कि जाति भेद के दिन समाप्त हो गए हैं और उसमें लगा विश्वास भी समाप्त होना चाहिए। जाति सूचक नाम मत लगाओ।’ विभिन्न रूपों में फैली दहेज प्रथा को प्रत्येक वर-वधू और उनके माता-पिता एक धार्मिक कर्तव्य समझकर इसे मिटाने का व्रत लें। हिन्दू विवाह में वर-वधू की पारस्परिक स्वीकृति निर्णायक होती है तो फिर दहेज की शर्त अनुचित, अमानवीय एवं अशास्त्रीय है जिसे वर-वधू को ही त्याग देना चाहिए। हिन्दू धर्म में कन्या, बहिन, पत्नी, माता एवं समस्त स्त्री जाति को पूजनीय, वंदनीय, रक्षणीय एवं आदरणीय माना गया है। बहुओं को सताना, जलाना एवं पारिवारिक कलह करना पाप है। अतः नारी जाति को सम्मान देना और उसकी रक्षा करना हम अपना धार्मिक कर्तव्य मानें। विवाह विच्छेद हिन्दू संस्कृति में अमान्य है। अतः हम इसे हतोत्साहित करें तथा पारिवारिक समरसता लाने का हर संभव प्रयास करें। बाल विवाह की प्रथा को मिटाऐं एवं विधवा विवाह, विशेषकर संतान रहित को बढ़ावा दें, क्योंकि यह शास्त्र सम्मत है। विधर्मियों का शुद्धिकरण कराने के साथ-साथ हिन्दू समाज की आंतरिक कमजोरियों प्रति सतर्क हो कार्य करने की आवश्यकता है, तभी शुद्धिकरण की गति में तेजी आएगी।