धर्मांतरण पर सुप्रीम कोर्ट का स्वागतयोग्य फैसला

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सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }:
देश के कई राज्यों में धर्मांतरण किया जाता है और कराया भी जाता है।कोई अपनी स्वेच्छा से धर्मांतरण करता है तो इसका कोई विरोध नहीं करता है। इस देश में लोगों का अपना धर्म चुनने की आजादी है। वह अपना धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म ग्रहण करते हैं। विरोध तो तब होता है जब किसी तरह का लोभ लालच देकर या किसी तरह का दबाब में आकर कोई धर्मांतरण करता है या बहुत से लोगों को कोई धर्मांतरण कराता है।इस तरह के धर्मांतरण से किसी गांव, किसी क्षेत्र में सामाजिक अशांति फैलती है, सामाजिक ताना बाना प्रभावित होता है। हिंसा की घटनाएं होती है। धर्मांतरण का विरोध तब भी होता है जब कोई व्यक्ति अपना धर्म बदल लेता है और जिस जाति का वह अब नहीं है, उस जाति को मिलने वाले लाभ भी लेता है और लेते रहना चाहता है तो यहा विवाद यह होता है कि जब उस व्यक्ति ने धर्मांतरण कर लिया है यानी धर्म बदल लिया है तो वह एससी,एसटी में उसे मिलने वाला लाभ अब कैसे ले सकता है क्योंकि वह अब एससी,एसीटी तो नही रहा।

कई आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सरकार से मांग की जाती रही है कि एससी,एसटी वर्ग का कोई व्यक्ति यदि धर्म बदल लेता है, वह हिंदू से ईसाई हो जाता है तो उसे अब तक जो एससी,एसटी का होने के कारण लाभ मिलता रहा है, वह लाभ उसे नहीं मिलना चाहिए।बस्तर में ऐसे व्यक्ति का शव के दफनाने को लेकर विवाद होता रहा है जिसने अपना धर्म बदल लिया है लेकिन उसके शव को गांव में दफनाया गया है। गांव वालों का कहना रहा है कि वह हमारे धर्म का नहीं है, हमारे रीतिरिवाज नहीं मानता है तो उसके शव को गांव में दफनाया नहीं जा सकता। इसके कारण कई गांवों में तनाव की स्थिति पैदा हुई है। यानी लोगों को साफ मानना है कि गांव को कोई व्यक्ति यदि दूसरे धर्म का अपनाता है तो उसे एससी,एसटी का होने पर जो सुविधा मिलती थी, जो लाभ मिलता था अब गांव में नहीं मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे एक मामले में अब साफ कर दिया है कि धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति जब दूसरा धर्म अपना लेता है तो वह एससी,एसटी का दर्जा खो देता है यानी वह एससी,एसटी नही रह जाता है। सुप्रीम कोर्ट के पास आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट से एक मामला आया था जिसमें यह फैसला दिया गया था कि अगर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है,ईसाई धर्म के अऩुसार जीता है तो उसे अनुसूचित जाति का व्यक्ति नहीं माना जा सकता। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि हिंदू धर्म,सिख धर्म व बौध्द धर्म के अलावा और किसी धर्म को मानने वाले व्यक्ति एससी,एसटी का नहीं माना जा सकता।इसलिए उसे धर्म बदलने के बाद एससी,एसटी का होने पर जो लाभ मिलता अब उसे नहीं मिल सकता।सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संविधानिक आदेश१९५० में साफ कहा गया है कि खंड तीन में बताए गए धर्मों के अलावा किसी भी धर्म में धर्मांतरण करने पर जन्म के बावजूद एससी,एसटी का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश ऐसे मामले में दिया है जिसमें अजा के व्यक्ति ने ईसाई धर्म अपना लिया है और पास्टर का काम कर रहा है,उसके साथ मारपीट होने पर उसने कुछ लोगों के खिलाफ एससी,एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था और संरक्षण की मांग की थी।उसने जिन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था,उन लोगों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी और दावा कि पी़ड़ित व्यक्ति तो ईसाई धर्म अपना चुका है।इस पर हाईकोर्ट ने एससी,एसटी एक्ट हटाने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं है।ऐसे में पीडित व्यक्ति एससी,एसटी कानून के प्रावधानों का लाभ लेने का पात्र नहीं है।हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ पास्टर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की तो सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के जज प्रशांत कुमार मिश्रा व एनवी अंजारिया ने कहा है कि इस मामले में यह अहम नहीं है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म से अपने मूल धर्म में धर्मांतरित हो गया है,या उसे मूल समुदाय ने स्वीकार कर लिया गया है या नहीं। बल्कि सबूतों से यह सिध्द होता है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म का पालन करता है और एक दशक से अधिक समय से बतौर पादरी काम कर रहा है।वह गांव के घर में नियमित तौर पर रविवार को प्रार्थना सभा आयोजित करता है।इन तथ्यों से इस बात में कोई शक नहीं है कि जब उसके साथ मारपीट हुई थी तो वह ईसाई था। इसलिए उसे अजा का नहीं माना जा सकता और अजा को मिलने वाला लाभ उसे नहीं मिल सकता।

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