युद्ध बंद हो जाए तो भी असर तो रहेगा ही
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: जब भी कोई वैश्विक घटना घटती है तो उससे विश्व के सभी देश प्रभावित होते हैंं क्योंकि बहुत सारे मामलों में सब एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं।युध्द से हर तरह की सप्लाई चेन प्रभावित होती है, इससे देशों में कई तरह की वस्तुओं की कमी हो जाती है और इसका खामियाजा बहुत सारे देशों को उठाना पड़ता है। इजराइल,अमरीका व ईरान युध्द के चलते मध्य पूर्व में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है और इसका खामियाजा मध्य पूर्व के देशों सहित विश्व के बहुत सारे देशों को भुगतना पड़ रहा है। खासकर डीजल,पेट्रोल व गैस को लेकर। बहुत सारे देशों में कमी के कारण इनके दाम बढ़ गए हैं।सब देश चाहते हैं कि युध्द खत्म हो ताकि ऊर्जा सप्लाई को लेकर जो चिताजनत स्थिति बनी हुई है, वह जल्द से जल्द सामान्य हो सके।युध्द तब ही समाप्त हो सकता है जब युध्द में उलझे देशों के बीच बातचीत शुरू हो।
अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी तरफ से ईरान के पावर प्लांटों पर हमलों को और पांच दिन रोकने की घोषणा की। उसके बाद खबर है कि उन्होंने पाकिस्तान के जरिए ईरान को खबर भिजवाया है कि अगर ईरान अमरीका के १५ सूत्रीय शांति योजना को मान लेता है तो अमरीका एक माह का युध्द विराम कर सकता है और शांति के लिए बातचीत शुरू हो सकती है। यहां एक बात साफ हो जाती है कि युध्दविराम की पहल अमरीका की तरफ से की जा रही है।इसका मतलब है कि युध्द से बाहर अमरीका निकलना चाहता है। वह लंबे समय तक युद्ध में फंसे नहीं रहना चाहता है क्योंकि इससे आने वाले दिनों में ट्रंप के लिए परेशानी बढ़ सकती है।युध्द के लिए सारे देश अमरीका को दोषी मान रहे हैं।युध्द के कारण पूरी दुनियां को होने वाली परेशानी का कारण भी ट्रंप को माना जा रहा है। इससे उनकी लोकप्रियता अमरीका में कम होती जा रही है।
जहां तक ट्रंप के युध्द से बाहर निकलने की जल्दी का सवाल है तो इसके कई कारण हो सकते हैं। एक कारण तो यह है कि युध्द में उसका बहुत सारा पैसा खर्च हो रहा है।युध्द लंबा चला तो और बहुत सारा पैसा खर्च होगा। युध्द के लिए रक्षा मंत्रालय ने बजट की मांग की है लेकिन ट्रंप की पार्टी ही इसके विरोध में है यानी बजट पास होना मुश्किल है। दूसरा ईरान ने अब इजराइल के परमाणु संयंत्रों पर हमला शुरू कर दिया है।तीसरा नाटों ने युध्द में मदद करने से मना कर दिया है यानी अमरीका युध्द अकेले ही लड़ना है।खाड़ी देशों में युध्द के कारण ४० प्रतिशत एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो गया है। इससे ग्लोबाल आयल सप्लाई घटती जा रही है।चौथा कारण है अमरीका में होने वाला मिडटर्म चुनाव।इस चुनाव में ट्रंप को सीनेट में बहुमत को बचाए रखना होगा। नहीं बचा पाएंगे तो उनकोे महाभियोग का सामना करना पड़ेगा।
अमरीका के राष्ट्रपति युध्द रोकने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन स्थिति इतनी जटिल है कि इसमें लंबा वक्त लग सकता है। इजराइल नहीं चाहता है कि ईरान को इस तरह छोड़ दिया जाए,खाड़ी के कई देश भी चाहते हैं कि ईरान को कमजोर किए बिना युध्द बंद नहीं होना चाहिए। खाड़ी के देश तो चाहते हैं कि जब युध्द हो रहा है तो ईरान का इतना कमजोर कर दिया जाना चाहिए कि वह फिर अपने आसपास के देशों पर हमला करने की हिम्मत न करे। वहीं चीन व रूस नहीं चाहते हैं कि ईरान इतना कमजोर हो जाए कि मध्य पूर्व में उनके किसी काम का न रहे।वह ईरान को मजबूत बनाए रखने के पक्षधर हैं।अमरीका की शांति योजना का मतलब यह तो है कि युद्ध बंद हो साथ ही उसमें ऐसी शर्तें हैं कि उनको मानने का मतलब है कि ईरान आज जितना मजबूत है,उतना मजबूत नहीं रह जाएगा। इसलिए इस बात की उम्मीद कम है कि ईरान अमरीका की सभी शर्ते मानेगा। वह भी अमरीकी शतों के बदले कई तरह की शर्तें रखेगा। यानी अभी कई दिन जोरआजमाइश होनी है।
हमारे देश के पीएम इस हकीकत को जानते हैं कि युध्द समाप्त भी हो जाएगा तो अभी गैस व तेल की आपूर्ति सामान्य होने में वक्त लगेगा। इसलिए उन्होंने देश के लोगों को विश्वास में लेते हुए कहा है कि मध्य पूर्व में संकट का असर लंबे समय तक रहेगा। इसका सामना करने के लिए देश के लोगों को धैर्य रखना होगा और एकजुट रहना होगा।देश में अराजकता फैलाने वाले कई तरह की अफवाहें फैला सकते है। लोगों को डराने का प्रयास कर सकते हैं जैसे खाड़ी युध्द के समय किया और उसका परिणाम क्या हुआ बड़ी संख्या मे लोग देश में गैस की कमी हो गई सोचकर गैस एजेंसी पहुंच गए।सभी न गैंस बुकिंग शुरू कर दी थी। ऐसी स्थिति फिर न पैदा हो इसलिए पीएम मोदी ने देश को लोगों को आश्वस्त किया है कि वह देश के लोगों के लिए जो भी जरूरी है वह सब करने का प्रयास कर रहे हैं और उम्मीद है कि जिस तरह देश कोरोना के वक्त एकजुट होकर संकट से बाहर निकला था, इसबार भी देश संकट के बाहर निकलने में सफल होगा।
