पश्चिम रेलवे के मेडिकल विभाग का कारनामा:₹58.23 लाख की सबसे कम बोली ठुकराई, वही ड्रग कोटेड बैलून ₹81.03 लाख में खरीदा

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इस फैसले से रेलवे को करीब ₹22.80 लाख का नुकसान

इस टेंडर में दो कंपनियों ने बोली लगाई थी—AADVENT-Mumbai (L1): ₹58.23 लाख MAP CHEM Pvt. Ltd. (L2): ₹81.03 लाख, दोनों की बोली में अंतर: ₹22.80 लाख

STORY BY NARENDRA GUPTA

मुंबई। पश्चिम रेलवे की एक मेडिकल खरीद में लिया गया फैसला अब सवालों के घेरे में है। सबसे कम कीमत देने वाली कंपनी को तकनीकी आधार पर बाहर कर दिया गया, जबकि उससे करीब ₹22.80 लाख अधिक कीमत वाली कंपनी को Purchase Order जारी कर दिया गया। इस फैसले से रेलवे को करीब ₹22.80 लाख का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा, जिसका बोझ अंततः सरकारी और आम जनता के पैसे पर पड़ा है।मामला दिल की बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाले Drug Coated PTCA Balloon (Sirolimus) की खरीद के  लिए जारी टेंडर का है।

क्या है पूरा मामला?

पश्चिम रेलवे ने Drug Coated PTCA Balloon (Sirolimus) की खरीद के लिए 20/11/2025 को Tender No. 29252129 जारी किया था। इस टेंडर में दो कंपनियों AADVENT-Mumbai  और MAP CHEM Pvt. Ltd.-Mumbai  ने हिस्सा लिया था   Financial Tabulation के अनुसार AADVENT-Mumbai ने सबसे कम यानी L1 के रूप में ₹58,23,930 की  बोली लगाई थी। वहीं MAP CHEM Pvt. Ltd.-Mumbai ने ₹81,03,900 की बोली लगाई थी।दोनों कंपनियों की बोली में करीब ₹22,79,970 का अंतर था। ड्रग कोटेड बैलून हृदय रोग के इलाज में इस्तेमाल होने वाला एक विशेष उपकरण है।
इसे दिल की संकरी या बंद हो रही नस को खोलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस बैलून पर दवा लगी होती है, जो नस को दोबारा संकरा होने से रोकने में मदद करती है।

शिशिर कुमार राउल  के तकनीकी फैसले पर उठे सवाल, L1 को बाहर कर L2 को बताया योग्य

पश्चिम रेलवे के इस मेडिकल टेंडर में सबसे अहम फैसला ACM/ACHDCardio Shishir Kumar Roul की Technical Scrutiny के बाद सामने आया। 31 दिसंबर 2025 की रिपोर्ट पर उनके डिजिटल हस्ताक्षर हैं, जिसमें सबसे कम दर वाली AADVENT-Mumbai (L1) को Unsuitable घोषित किया गया, जबकि अधिक कीमत वाली MAP CHEM Pvt. Ltd. (L2) को Technically Suitable बताया गया। यही फैसला अब सवालों के घेरे में है, क्योंकि L1 कंपनी की बोली करीब ₹22.80 लाख कम थी। ऐसे में तकनीकी आधार पर L1 को बाहर करने और L2 को योग्य घोषित करने का निर्णय संदेह पैदा करता है और इसकी विस्तृत जांच की जरूरत है। 

टेंडर जारी होने से 54 दिन पहले सप्लायर को किसने दी टेंडर की जानकारी? ऑथराइजेशन लेटर ने बढ़ाया संदेह

सूरत स्थित Concept Medical Research Pvt. Ltd., जो भारत में ‘Magic Touch’ ब्रांड के तहत (इस उत्पाद की आपूर्ति करती है) ने इस टेंडर के लिए MAP CHEM Pvt. Ltd. के पक्ष में OEM Authorization जारी किया था।

MAP CHEM के पक्ष में जारी 27 सितंबर 2025 के Authorization Letter में Tender No. 29252129 और Publishing Date 20 नवंबर 2025 पहले से दर्ज थी, जबकि पश्चिम रेलवे ने यह टेंडर 20 नवंबर 2025 को सुबह 11:34 बजे सार्वजनिक किया। यानी टेंडर जारी होने से करीब 54 दिन पहले के दस्तावेज में उसका नंबर और प्रकाशन तिथि दर्ज होने से गंभीर सवाल उठते हैं कि क्या कंपनी को टेंडर की जानकारी पहले ही मिल गई थी। हालांकि, Concept Medical ने अपने बचाव में इसे केवल “Date Mistake” बताया है। अब जांच का विषय है कि यह वास्तव में महज दस्तावेजी गलती थी या फिर टेंडर से जुड़ी जानकारी पहले से संबंधित कंपनी तक पहुंचाई गई थी।

L1 के बाहर होने के बाद भी नहीं कराया री-टेंडर, ₹22.80 लाख की अतिरिक्त खरीद पर सवाल

सबसे कम दर वाली L1 कंपनी को तकनीकी आधार पर अयोग्य घोषित किए जाने के बाद टेंडर प्रक्रिया में केवल एक कंपनी बची। इसके बावजूद पश्चिम रेलवे ने दोबारा प्रतिस्पर्धी बोलियां आमंत्रित करने के बजाय उसी कंपनी को खरीद आदेश जारी कर दिया। सवाल उठ रहा है कि यदि री-टेंडर कराया जाता, तो प्रतिस्पर्धी दरों के जरिए रेलवे को कम कीमत मिल सकती थी और करीब ₹22.80 लाख का अतिरिक्त खर्च बचाया जा सकता था।

कई स्तरों पर हुई टेंडर जांच, फिर भी संदिग्ध OEM दस्तावेज पर किसी की नजर क्यों नहीं पड़ी?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब L1 कंपनी को तकनीकी आधार पर अयोग्य घोषित किया गया, तो MAP CHEM Pvt. Ltd. के पक्ष में जारी OEM Authorization Letter में दर्ज संदिग्ध तारीख और टेंडर से जुड़ी जानकारी की जांच क्यों नहीं की गई? टेंडर की शर्तों में गलत या भ्रामक दस्तावेज मिलने पर bidder को अयोग्य घोषित किए जाने का प्रावधान था।

टेंडर प्रक्रिया में दस्तावेजों की जांच अलग-अलग स्तर पर अधिकारियों द्वारा की जाती है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि टेंडर जारी होने से 54 दिन पहले की तारीख वाले OEM Authorization Letter में Tender Number और भविष्य की Publishing Date दर्ज होने पर क्या किसी अधिकारी की नजर पड़ी थी? क्या किसी अधिकारी ने इस पर आपत्ति दर्ज की, स्पष्टीकरण मांगा या अपनी file noting में इस विसंगति का उल्लेख किया? यदि ऐसी कोई आपत्ति या noting की गई थी, तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? और यदि किसी स्तर पर इस पर सवाल ही नहीं उठाया गया, तो कई स्तरों की जांच के बावजूद इतना असामान्य दस्तावेज कैसे स्वीकार कर लिया गया? इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा कि यह केवल दस्तावेजी गलती थी या टेंडर प्रक्रिया में किसी स्तर पर गंभीर चूक हुई।

यह मामला केवल ₹22.80 लाख के अतिरिक्त खर्च तक सीमित नहीं है। हमारी आगे की पड़ताल में टेंडर की पूरी प्रक्रिया—टेंडर की शर्तें किसने तैयार कीं, तकनीकी जांच किस स्तर पर हुई, L1 कंपनी को किन आधारों पर बाहर किया गया और OEM दस्तावेज में सामने आई विसंगति पर किस अधिकारी ने क्या कार्रवाई की—इन सभी पहलुओं की गहराई से जांच की जाएगी।

RTI दस्तावेजों, फाइल नोटिंग, अधिकारियों की टिप्पणियों और टेंडर से जुड़े अन्य रिकॉर्ड के आधार पर इस मामले की परत-दर-परत पड़ताल जारी रहेगी। नए तथ्य और दस्तावेज सामने आने पर जिम्मेदारी तय करने से जुड़े सवालों को भी प्रमुखता से उठाया जाएगा।

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