पार्टी टूटती है जब नेता तानाशाह हो जाता है
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: देश में बहुत कम राजनीतिक दल हैं जो किसी आंदोलन के कारण बने हैं। आम आदमी पार्टी एक ऐसा ही राजनीतिक दल है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में हुए आंदोलन से बना। कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुद्दे को ईमानदार नेता अन्ना हजारे ने उठाया और देश में परिवर्तन की लहर पैदा की। इस परिवर्तन की लहर के चलते कांग्रेस सत्ता से हटाई गई और पीएम मोदी के नेतृत्व में एक ऐसी सरकार बनी जैसी सरकार बरसों से जनता चाहती थी लेकिन वह बन नहीं पाती थी, वह गिर जाती थी या गिरा दी जाती थे।अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते बहुत सारे नेता एकत्र हुए और अन्ना हजारे के न चाहने पर भी आम आदमी पार्टी के रूप में एक राजनीतिक दल बनाया गया। आम आदमी पार्टी को सही मायने में अच्छे नेताओं ने मिलकर बनाया था।इसके सारे अच्छे नेताओं को एक एक कर अरविंद केजरीवाल ने पार्टी से निकालकर या पार्टी छोड़ने को मजबूर कर आप पर कब्जा कर लिया।
जब किसी पार्टी पर एक नेता या कुछ नेताओं का कब्जा हो जाता है तो वही होता है जो आप में हो रहा है। या तो नेता पार्टी के नेताओं को पार्टी से निकालता है या पार्टी के नेता खुद ही पार्टी छोेड़कर चले जाते हैं।सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस हैं, कांग्रेस में एक परिवार का कब्जा है इसलिए कई बड़े नेता पार्टी छोड़ने को मजबूर कर दिये जाते हैं और शरद पवार व ममता बैनर्जी जैसे लोग कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बना लेते हैं।जब भी किसी राजनीतिक पर एक नेता या कुछ नेताओं का कब्जा हो जाता है वह चाहते हैं कि लोग वही करें जो वह चाहते हैं। वह वही करें जो वह कहते हैं, वह वही कहें जो वह कहने को कहते हैं। पार्टी पर कब्जा कर खुद को सबसे शक्तिशाली नेता समझने वाले लोग भूल जाते हैं कि पार्टी तब ही मजबूत होती है जब उसमें बहुत सारे मजबूत नेता होते है।
अरविंद केजरीवाल बातें को बहुत बड़ी बड़ी करते हैं लेकिन हकीकत में वह दूसरे परिवारवादी दलो के नेताओं की तरह ही है यानी पार्टी के लोग वही करें जो मै कहता है, वहीं करें जो मैं करने को कहता हूं। मैं मोदी व भाजपा का विरोध कर रहा हैं सबको भाजपा व मोदी को विरोध करना है और सिर्फ यही करना है।किसी भी पार्टी में जो समझदार नेता होते हैं वह तानाशाही सहन नहीं कर पाते हैं। राघव चड्डा आप के ऐसे नेता हैं जिनकी अपनी छवि जनता के मुद्दे उठाने नेता की हैं और उन्होंने संसद के पिछले एक दो सत्र में जनता के मुद्दे उठाए और उनकी देश में वाहवाही भी हुए कि वह आप के दूसरे नेताओं जैसे नहीं है,वह जनता के नेता है, जनता के मुद्दे उठाते हैं।ऐसी छवि आप के किसी नेता को बने यह केजरीवाल को पसंद आ ही नहीं सकता था क्योंकि केजरीवाल को वहम है कि आप में वही एक नेता ऐसे हैं जो जनता के मुद्दे उठाता है।
राघव चड्डा से आप मे रहते हुए यह गलती हो गई कि उन्होंने खुद को केजरीवाल से बेहतर नेता बताने की कोशिश की और उनको ऐसा नेता माना गया तो केजरीवाल को लगा होगा कि यह तो मेरी बराबरी कर रहा है यानी जनता का नेता बनने की कोशिश कर रहा है। इसलिए राघव चड़्डा को राज्यसभा में पहले पार्टी के उपनेता पद से हटाया गया और बता दिया गया कि पार्टी में अब उनकी वह जगह नहीं है जो अब तक थी।इसके बाद केजरीवाल का अगला कदम होता कि उनको किसी बहाने से पार्टी से निकाल दिया जाता। इससे पहेल की केजरीवाल राघव चड्डा को पार्टी से निकालते राघव चड़़्डा ने केजरीवाल को ऐसा सबक सिखाया है जो और कोई नेता नहीं सिखा पाया।राघव चड्डा आप के छह राज्यसभा सांसदों के साथ अलग होकर भाजपा में शामिल हो गए।
यह तो केजरीवाल को जख्म देकर उस पर नमक छिड़कने जैसा काम हो गया। राघव चड्डा पार्टी से अलग हो जाते यह केजरीवाल के लिए छोडा झटका होता क्योंकि वह उनको खुद ही देरसबेर पार्टी से निकालते ही क्योंकि जो कोई नेता भी खुद को केजरीवाल से बेहतर बताने या जताने को कोशिश करता है, केजरीवाल उसे पार्टी में रहने नहीं देते हैं। राघव चड़़्डा खुद तो भाजपा में गए और साथ में छह और लोगों को भी ले गए। यानी दिल्ली पंजाब में भाजपा को ऐसे नेताओं की जरूरत थी जो केजरीवाल के खिलाफ दिल्ली,पंजाब में कुछ बोले तो लोगों को यह लगे कि वह सच कह रहे है।दिल्ली से केजरीवाल को उखाड़ने के बाद उनकी जड़े पंजाब मे खोेदी जाएंगी और इस काम में राघव चड्डा आदि नेताओं का उपयोग किया जाएगा।पंजाब में वैसे ही भाजपा को नेताओं की जरूरत है अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए। राघव चड़़्डा ने भाजपा मे शामिल होकर यह काम कुछ आसान कर दिया है।
