राजनाथ सिंह ने जर्मन उद्योग को ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत मिलकर काम करने का न्योता दिया

0
678315628_1538431857648251_6730626108787462808_n
  • भारत और जर्मनी के बीच लंबे समय तक चलने वाले सांस्कृतिक और बौद्धिक संबंधों पर जोर

नई दिल्ली/बर्लिन{ गहरी खोज }: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जर्मन उद्योग को उभरते सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए आत्मनिर्भर भारत के तहत मिलकर काम करने का न्योता दिया। रक्षा मंत्री ने बर्लिन में हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी के परिसर में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को पुष्पांजलि अर्पित की और भारत और जर्मनी के बीच लंबे समय तक चलने वाले सांस्कृतिक और बौद्धिक संबंधों पर जोर दिया। राजनाथ सिंह ने कहा कि पश्चिम एशिया की स्थिति को देखते हुए भारत की रणनीति वैश्विक संकटों का जवाब देने की उसकी क्षमता को दिखाती है।
रक्षा मंत्री ने बर्लिन में जर्मन सांसदों से कहा कि आत्मनिर्भर भारत सिर्फ एक खरीद प्रोग्राम नहीं है, बल्कि यह मिलकर विकास करने का न्योता है। उन्होंने भारत और जर्मनी के रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र के बीच बेहतर सहयोग की जोरदार वकालत की। यूरोपियन देश के अपने तीन दिन के दौरे के पहले दिन रक्षा और सुरक्षा पर जर्मन संसद की स्टैंडिंग कमेटी को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने जोर देकर कहा कि आज दुनिया नए सुरक्षा खतरों का सामना कर रही है। तकनीक में बदलाव ने स्थिति को बहुत मुश्किल और आपस में जुड़ा हुआ बना दिया है। उन्होंने कहा कि बदलते माहौल के हिसाब से ढलने की इच्छा के साथ एक नया तरीका खोजना आज की जरूरत है।
रक्षा मंत्री ने कहा कि हम जर्मनी के उद्योगों की पहले से बनी ताकत को पहचानते हैं। साथ ही भारत में भी हमारे स्टार्ट-अप और आगे बढ़ने वाली प्राइवेट कंपनियां तेजी से हमारी बड़ी और पहले से बनी डिफेंस कंपनियों की काबिलियत को बढ़ा रही हैं और उन्हें पूरा कर रही हैं। यह एक ऐसा एरिया है, जहां भारत और जर्मनी एक-दूसरे के पूरक हैं और हमारी साझेदारी और मजबूत हो सकती है। आज के जमाने की वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए राजनाथ सिंह ने मिलकर जवाब देने और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदारी की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हम यूरोपियन यूनियन पर भी विचारों में साफ समानता देख रहे हैं, जो भारत के साथ जुड़ने की बढ़ती रफ्तार में दिखती है, जिसमें इंडिया-ईयू डिफेंस और रणनीतिक साझेदारी भी शामिल है।
रक्षा मंत्री ने दोहराया कि भारत और जर्मनी न सिर्फ रणनीतिक साझेदार हैं, बल्कि आज के समय में वैश्विक बातचीत को आकार देने में अहम आवाज भी हैं। जब इस युग के इतिहास को लिखा जाएगा, तो भारत-जर्मनी साझेदारी कूटनीति की एक मिसाल के तौर पर खड़ी होगी, जो संकट के जवाब में नहीं, बल्कि दो परिपक्व लोकतंत्रों के इस रास्ते पर एक साथ चलने के पक्के इरादे से बनी होगी। राजनाथ सिंह ने बताया कि मौजूदा भू-राजनैतिक अस्थिरता को अब क्षेत्रीय मामलों के तौर पर नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि इसके नतीजे ग्लोबल हैं और इनका ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक आर्थिक स्थिरता पर दूरगामी असर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि भारत जैसा विकासशील देश अपनी एनर्जी जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए पश्चिम एशियाई क्षेत्र पर निर्भर है। होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावटें कोई दूर की बात नहीं हैं, वे हमारी सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर सीधा असर डालने वाली कठोर सच्चाई हैं। रक्षा मंत्री ने बताया कि इन चुनौतियों और उनके सीधे असर को देखते हुए भारत ने रणनीति अपनाई। उन्होंने सांसदों को बताया कि पश्चिमी एशिया पर मंत्रियों का एक ग्रुप लगातार बदलते हालात का आकलन कर रहा है और इसके असर को कम करने के लिए समय पर उपाय सुझा रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *