इरविन खन्ना संपादकीय { गहरी खोज }: संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद इस बिल के तहत 79 विभिन्न कानूनों से जुड़े 1000 प्रावधानों को बदल दिया गया है। छोटी-मोटी गलतियों को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए उस अपराध के लिए सिर्फ जुर्माने का प्रविधान किया गया है। वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि अति मामूली गलतियों को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया था और इस प्रकार के अपराधों से जुड़े पांच करोड़ से अधिक मामले देशभर की अदालतों में लंबित हैं। केन्द्र सरकार राज्यों से जन विश्वास बिल के प्रविधानों के तहत उन मुकदमों को समाप्त करने के लिए कहेगी। भाजपा ने संसद में जन विश्वास विधेयक, 2026 पारित होने का स्वागत करते हुए इसे भारत में जीवन यापन और व्यापार करने की सुगमता बढ़ाने की दिशा में एक निर्णायक और सार्थक कदम बताया है। गोयल ने बताया कि फाइन के लिए कोर्ट केस करना होता है और इसमें पुलिस की भी संलग्नता होती है, जबकि पेनाल्टी के लिए पुलिस केस करने की जरूरत नहीं होती है। कोई विभाग पेनाल्टी कर सकता है इसलिए जन विश्वास बिल में फाइन की जगह पेनाल्टी का प्रविधान किया गया है। देश के 12 राज्य जन विश्वास बिल का अपना वर्जन लाए हैं। अन्य राज्यों को भी जन विश्वास बिल का अपना वर्जन लाने के लिए कहा गया है। छोटे अपराधों को अपराध क्षेत्र से बाहर करने से जहां न्यायालयों में मुकदमों का बोझ कम होगा वहीं जन साधारण को भी राहत मिलेगी। अब ड्राइविंग लाइसेंस की अवधि खत्म होने पर भी वह 30 दिन तक वैध रहेगा और राष्ट्रीय राज मार्ग पर जाम लगाने पर सजा के स्थान पर जुर्माने का प्रविधान होगा। इसी तरह अन्य अनेक मामलों में ऐसा होगा। इनमें से कई मामले कारोबारियों से भी जुड़े हैं, जैसे पहले ड्रग्स एवं कास्मेटिक नियमों के उल्लंघन पर जेल हो सकती थी, लेकिन अब केवल जुर्माना लगेगा। जो छोटे कारोबारी प्रायः जटिल नियम कानूनों के अनचाहे उल्लंघन के कारण दंडित होने के दबाव में रहते थे, वे अब भयमुक्त होंगे। इस विधेयक के प्रविधानों से आम जनता को अवगत कराया जाए, ताकि वह अधिकतम लाभ उठा सके और शोषण एवं भ्रष्टाचार से भी बच सके। ध्यान रहे आम लोग सशक्त तब होते हैं, जब वे नियम-कानूनों से भली तरह अवगत होते हैं। जनता को बदले हुए नियम-कानूनों से परिचित कराने का काम सरकार को करना चाहिए। इसी के साथ उसे इसे लेकर सावधान रहना होगा कि छोटे अपराधों में जेल भेजने वाले प्रविधानों की जगह चेतावनी देने और जुर्माना लगाने वाली नई व्यवस्था से समाज में ऐसा कोई संदेश न जाए कि नियम-कानूनों के उल्लंघन पर जुर्माना देकर बचा जा सकता है। यदि जुर्माना देकर नियम-कानूनों को हल्के में लेने की प्रवृत्ति बढ़ी तो इस विधेयक का उद्देश्य ही व्यर्थ हो जाएगा। लोगों को यह समझना आवश्यक है कि अधिकारों के साथ कर्तव्यों के पालन से ही कोई राष्ट्र प्रगति पथ पर तेजी से आगे बढ़ता है।