साय आदिवासी समाज का हित बता रहे

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सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }:
हर क्षेत्र में आदमी की अलग अलग भूमिका होती है, जब जैसी उसकी भूमिका होती है, वह वैसा सोचता है और लोगों से कहता भी है कि यही उनके हित में है। जब वह परिवार के बारे में सोचता है तो वह परिवार के हित के बारे में सोचता है, परिवार के हित के बारे कहता है। तब वह न तो समाज हित व देश के हित में बारे में नहीं सोचता है, नहीं कहता है। इसी तरह जब आदमी समाज के हित में सोचता है तो वह समाज के हित में क्या कहता है,समाज के लोगों से कहता है। वह लोगों से कहता है जो समाज हित में है वह परिवार के हित में है। कई बार जो समाज हित में होता है या परिवार हित में होता है वह देश हित में नहीं होता है।सोच का दायरा जैसा होता है, जितना होता है, आदमी उतना ही सोचता है उतना ही कहता है।

आदिवासी नेता नंदकुमार साय ने एक अहम बैठक में अन्य आदिवासियों नेताओं की मौजूदगी में अपने संबोधन में कहा कि हम दो हमारे दो नीति का सबसे ज्यादा पालन आदिवासी समाज ने किया।इसका खामियाजा समाज को भुगतना पड़ रहा है।बैठक में उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि आदिवासियों की आबादी लगातार घट रही है।यही स्थिति बनी रही तो समाज की सामाजिक,सांस्कृतिक व राजनीतिक ताकत कम हो जाएगी।जनसंख्या संतुलन बनाए रखने के लिए अब हर आदिवासी परिवार को पांच बच्चे पैदा करने चाहिए। साथ ही उन्होंने समाज को यह भी समझाइश दी है कि जनगणना के दौरान धर्मकोड के क़़ॉलम में आदिवासी ही लिखाना चाहिए।

इसे लेकर आदिवासी समाज में राजनीति तो होनी ही थी और कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने भाजपा को घेरते हुए कहा है कि नंदकुमार साय भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं।इसलिए उनके पांच बच्चे के बयान पर भाजपा को अपना स्टैंड साफ करना चाहिए।बैज ने साय के आदिवासी समाज को दी गई सलाह को गलत सलाह बताते हुए कहा है कि मैं खुद आदिवासी समाज से हूं लेकिन एक शिक्षित नागरिक होने के नाते मैं कभी आदिवासी समाज को ऐसी सलाह नहीं दूंगा।भाजपा इसे निजी राय बताकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।सीएम साय ने इस मामले में कहा है कि नंद कुमार साय का व्यक्तिगत विचार है।वे एक वरिष्ठ आदिवासी नेता हैं और उन्होंने अपनी बात समाज के सामने सोच समझ कर रखी होगी।

नंदकुमार साय आदिवासी समाज की बैठक में एक आदिवासी नेता के रूप मे बोल रहे हैं तो वह राजनीति से जुड़े हुए हैं इसलिए जो राजनीतिक रुप से समाज के हित में है,वही तो बोल रहे हैं।समाज का नेता तो समाज के हित में बोलेगा। यही साय कर रहे हैं। वह जानते हैं कि लोकतंत्र में जिसकी संख्या ज्यादा होती है,उसे हर क्षेत्र में उसके हिसाब से लाभ मिलता है।उनको लगता है कि आदिवासी समाज के लोगों की संख्या बढ़ने से आदिवासियों को राजनीतिक रूप से ज्यादा महत्व मिलेगा, ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलेगा। भाजपा छोड़कर कांग्रेस जाने व कांग्रेस से वापस भाजपा में आने से राज्य व समाज में उनकी पूछपरख कम हो गई है फिर भी वह हैं तो आदिवासी नेता। आदिवासियों के हित बात करेंगे तब ही तो आदिवासी नेता बने रहेंगे।

नंदकुमार साय यदि कांग्रेस में होते तो शायद आदिवासी नेता दीपक बैज उनकी इस बात के लिए आलोचना नहीं करते कि वह आदिवासियों को पांच बच्चे पैदा करने के लिए कह रहे हैं क्योंकि तब उनको लगता कि नंदकुमार साय सही कह रहे हैं क्योंकि ज्यादा आदिवासी होंगे तो कांग्रेस को ज्यादा वोट देंगे। अब एक तो नंदकुमार कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आ गए हैं और संघ, भाजपा नेताओं की तरह आदिवासियों को संख्या बढ़ाने को कह रहे हैं तो दीपक बैज को एक कांग्रेस नेता होने के नाते नंद कुमार साय का बयान गलत को लगना ही है। वहीं आदिवासी नेता सीएम विष्णु देव साय भी हैं लेकिन उन्होंने नंद कुमार साय को गलत नहीं कहा है। उन्होंने कहा है कि नंद कुमार साय ने ऐसा कहा है तो बहुत सोचसमझ कर कहा होगा। सीएम साय जानते हैं कि नंद कुमार साय वरिष्ठ आदिवासी नेता हैं इसलिए उन्होंने उनका सम्मान किया।जबकि राजनीति के चक्कर में बैज भूल गए कि नंद कुमार साय आदिवासी समाज के वरिष्ठ नेता हैं और उनको गलत बताने का प्रयास किया है।

राजनीतिक दलों की अपनी विचारधारा होती है,अपनी सोच होती है।आजादी के बाद से देश में बढ़ती जनसंख्या को एक गंभीर समस्या के रूप में देखा जाता रहा है। इसका समाधान जनसंख्या नियंत्रण बताया जाता रहा है। सारा जोर जनसंख्या कम करने पर रहा है। कांग्रेस के समय हम दो हमारे दो ही किसी परिवार के लिए आदर्श स्थिति मानी जाती रही है। भाजपा के समय यानी २०१४ के बाद से बड़ी आबादी को बड़ी समस्या के रूप में नहीं देखा जा रहा है। बड़ी आबादी को राजनीतिक रूप से विशाल हिंदू वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है। आर्थिक रूप से दुनियां के सबसे बड़े बाजार के रूप में देखा जा रहा है। इसलिए जब भी दूसरे समाज की आबादी से तुलना की बात आती है तो भाजपा व संघ के नेता परिवार में दो की जगह तीन बच्चे का समर्थन करते हैं ताकि हिंदू समाज की आबादी बढ़े और हिंदू समाज ज्यादा संख्या होने के कारण राजनीतिक रूप से मजूबत हो सके।

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