भारतीय फ़ैशन में हस्तनिर्मित वस्त्रों की वापसी ने बुनकरों के लिए नए रास्ते खोले हैं। बनारसी, चंदेरी, माहेश्वरी, इक्कत और पोचमपल्ली जैसे पारंपरिक वस्त्र अब महानगरों के साथ-साथ ऑनलाइन बाज़ार में भी ख़ूब पसंद किए जा रहे हैं।
क्यों बढ़ी मांग
- हर टुकड़े का अनोखा होना — मशीनी उत्पादों से अलग पहचान
- जीआई टैग से असली उत्पाद की पहचान आसान
- सोशल मीडिया के ज़रिए कारीगरों की सीधी पहुंच
- सस्टेनेबल फ़ैशन को लेकर बढ़ती जागरूकता
ख़रीदते समय ध्यान दें
असली हैंडलूम की पहचान के लिए हैंडलूम मार्क या जीआई टैग देखें। हाथ से बुने कपड़े में हल्की अनियमितता स्वाभाविक होती है — यही उसकी ख़ासियत है, दोष नहीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सीधे बुनकर समितियों या प्रमाणित प्लेटफ़ॉर्म से ख़रीदने पर कारीगर तक उचित दाम पहुंचता है, जो इस शिल्प को ज़िंदा रखने के लिए ज़रूरी है।