अभिषेक मनु सिंघवी ने मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने को बताया गैर-कानूनी, चुनाव आयोग से हस्तक्षेप की मांग
नई दिल्ली{ गहरी खोज }: मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने का मामला राजनीतिक और कानूनी विवाद का विषय बन गया है। कांग्रेस ने इस फैसले को पूरी तरह अवैध और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत बताते हुए चुनाव आयोग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
कांग्रेस के विधि, सूचना का अधिकार (आरटीआई) एवं मानव संसाधन विभाग के प्रमुख अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ कानून की नजर में कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है, इसलिए उनके नामांकन को रद्द करने का कोई वैधानिक आधार नहीं बनता। उन्होंने रिटर्निंग ऑफिसर के निर्णय पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे कानून की गलत व्याख्या बताया।
कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव एवं संचार, प्रचार और मीडिया विभाग की प्रमुख रुचिरा चतुर्वेदी द्वारा सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किए गए एक वीडियो संदेश में सिंघवी ने कहा कि वह वर्तमान में विदेश में हैं, लेकिन उन्होंने मीनाक्षी नटराजन और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से इस मामले में विस्तार से बातचीत की है। उन्होंने कहा कि यह जानकर उन्हें आश्चर्य हुआ कि रिटर्निंग ऑफिसर ने नटराजन का नामांकन पत्र अस्वीकार कर दिया, जबकि उनके खिलाफ कोई ऐसा आपराधिक मामला दर्ज नहीं है जिसका उल्लेख नामांकन पत्र में करना अनिवार्य हो।
सिंघवी ने कहा कि किसी भी व्यक्ति द्वारा दायर निजी शिकायत तब तक आपराधिक मामला नहीं मानी जाती, जब तक संबंधित मजिस्ट्रेट या न्यायालय उस पर संज्ञान नहीं लेता। उन्होंने स्पष्ट किया कि मीनाक्षी नटराजन के मामले में केवल एक नोटिस जारी हुआ था, जबकि अदालत ने अभी तक मामले पर संज्ञान नहीं लिया है। ऐसे में इसे आपराधिक मामला मानना न्यायिक सिद्धांतों और स्थापित कानूनी प्रक्रिया के विपरीत है।
उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायशास्त्र और विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों में यह सिद्धांत स्पष्ट रूप से स्थापित है कि केवल नोटिस जारी होना किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कांग्रेस ने यह कानूनी पक्ष रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष भी रखा था, लेकिन इसके बावजूद नामांकन रद्द कर दिया गया।
सिंघवी ने आरोप लगाया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने इस मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष दृष्टिकोण नहीं अपनाया। उन्होंने कहा कि यदि तथ्यों और कानून के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लिया जाता, तो नामांकन पत्र अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं था। उन्होंने चुनाव आयोग से अपील की कि वह अपने प्रशासनिक और संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए इस फैसले की समीक्षा करे और इसे निरस्त करे।
उल्लेखनीय है कि मंगलवार को रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर से दर्ज कराई गई आपत्ति को स्वीकार करते हुए मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द कर दिया था। भाजपा का आरोप है कि नटराजन ने तेलंगाना में लंबित एक मामले की जानकारी नामांकन पत्र में नहीं दी थी, जो निर्वाचन नियमों के तहत आवश्यक थी।
वहीं कांग्रेस का कहना है कि संबंधित मामले में न तो कोई प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज हुई थी और न ही अदालत ने उस पर संज्ञान लिया था। केवल एक नोटिस जारी किया गया था, जिसका जवाब नटराजन की ओर से विधिवत दे दिया गया था। इसलिए उसका उल्लेख नामांकन पत्र में करना कानूनी रूप से आवश्यक नहीं था।
नामांकन रद्द होने के बाद मीनाक्षी नटराजन ने भाजपा पर राजनीतिक दबाव बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भाजपा ने पर्याप्त संख्या बल न होने के बावजूद तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारा और कांग्रेस को पहले से आशंका थी कि चुनावी प्रक्रिया में बाधाएं उत्पन्न की जाएंगी। उन्होंने आरोप लगाया कि जब भाजपा को कांग्रेस विधायकों की एकजुटता का एहसास हुआ, तब कानूनी नोटिस को आधार बनाकर उनके नामांकन को चुनौती दी गई।
कांग्रेस सांसद विवेक तनखा ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह केवल 10 करोड़ रुपये के कथित मुआवजे से जुड़ा एक सिविल प्रकृति का नोटिस था, जिसका जवाब पहले ही दिया जा चुका था। उन्होंने नामांकन रद्द करने के फैसले को कानूनी रूप से कमजोर बताया।
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने मामले को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल को मिलने तक की अनुमति नहीं दी। उन्होंने कहा कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
राजनीतिक दृष्टि से इस फैसले का असर राज्यसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है। यदि कांग्रेस को चुनाव आयोग अथवा उच्चतम न्यायालय से राहत नहीं मिलती है, तो मध्य प्रदेश की तीनों रिक्त राज्यसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों के निर्विरोध निर्वाचित होने की संभावना बढ़ जाएगी। भाजपा के उम्मीदवार तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल की जीत पहले से लगभग सुनिश्चित मानी जा रही है, जबकि तीसरे उम्मीदवार महेश केवट की उम्मीदवारी ने चुनावी मुकाबले को नया राजनीतिक आयाम दे दिया है।
गौरतलब है कि संभावित क्रॉस-वोटिंग या राजनीतिक टूट-फूट की आशंका को देखते हुए कांग्रेस ने अपने विधायकों को पहले ही बेंगलुरु भेज दिया था। अब पार्टी कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी में जुटी हुई है।
