न्यायिक अधिकारियों का घेराव
- इरविन खन्ना
संपादकीय { गहरी खोज }:पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए गए सात न्यायिक अधिकारियों को प्रदर्शनकारियों ने 9 घंटे तक बंधक बनाकर रखा। प्रदर्शनकारी मतदाता सूची में अपना नाम हटाए जाने के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे थे। सुरक्षा बलों ने देर रात तीन महिलाओं सहित न्यायिक अधिकारियों को बचाया। विशेष गहन पुनरीक्षण के विरोध में कई अन्य जिलों में भी प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे और राजमार्गों को बंद कर दिया।
पश्चिम बंगाल में जिस तरह ममता सरकार क्षेत्रवाद के नाम पर मतदाता का ध्रुवीकरण कर रही है और केन्द्र सरकार के प्रति एक नकारात्मक और टकराव वाली नीति अपना कर चल रही है यह न तो बंगाल के हित में है और न ही देश के हित में। केन्द्र सरकार की हर नीति का विरोध कर एक वर्ग विशेष को अपनी ओर आकर्षित करने से क्षणिक लाभ तो हो सकता है लेकिन यह लम्बी राजनीतिक लड़ाई में हानिकारक ही सिद्ध होगा। उपरोक्त घटना की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने जहां पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ अधिकारियों से बैठक कर अपनी नाराजगी दिखाई वहीं राष्ट्रीय जांच एजेंसी को जांच करने को कहा है।
घटना की कड़ी निंदा करते हुए न्यायालय ने कहा कि यह घटना ‘राज्य प्रशासन की पूर्ण विफलता को भी उजागर करती है’ और ‘न्यायिक अधिकारियों को धमकाने का न सिर्फ एक बेशर्म प्रयास’ था, बल्कि यह इस उच्चतम न्यायालय के अधिकार को चुनौती देने के बराबर भी था। इसे गैर-राजनीतिक विरोध बताने वाली दलीलों को खारिज करते हुए, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह कोई सामान्य घटना नहीं थी। बल्कि, यह न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराने का एक सुनियोजित और जानबूझकर किया गया कदम प्रतीत होता है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, अगर यह विरोध प्रदर्शन गैर-राजनीतिक था, तो राजनीतिक नेता क्या कर रहे थे? क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे मौके पर जाकर देखें कि क्या हो रहा है? क्या कोई कानून-व्यवस्था अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है? शाम पांच बजे इन लोगों ने अधिकारियों को घेर लिया और रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां नहीं था। न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह राज्य में पर्याप्त केंद्रीय बलों की मांग करे और उन्हें उन सभी स्थानों पर तैनात करे जहां मतदाता सूचियों की एसआइआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया के तहत न्यायिक अधिकारी आपत्तियों का निपटारा कर रहे हैं। उन्होंने कहा, निर्वाचन आयोग को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वह कल की घटना की जांच पड़ताल किसी स्वतंत्र एजेंसी यानी सीबीआइ या एनआइए को सौंपे। अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की जाए। जिस एजेंसी को जांच सौंपी जाएगी, वह सीधे इस न्यायालय में प्रारंभिक रिपोर्ट दाखिल करने के लिए बाध्य होगी। गौरतलब है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूचियों से बाहर किए गए 60 लाख से अधिक लोगों की आपत्तियों के निस्तारण के लिए पश्चिम बंगाल, ओड़ीशा और झारखंड के लगभग सात सौ न्यायिक अधिकारियों को चल रही एसआइआर प्रक्रिया में तैनात किया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य के मुख्य सचिव पुलिस प्रमुख सहित मालदा के जिलाधिकारी और पुलिस प्रमुख को कारण बताओ नोटिस देकर यह पूछा है कि उनके विरुद्ध कार्रवाई क्यों न की जाए। इन अधिकारियों को 6 अप्रैल को डिजिटल माध्यम से पेश होने के आदेश दिए हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी जिस तरह लोगों की भावनाओं को क्षेत्रवाद तथा सम्प्रदाय के आधार पर भड़का कर अपना वोट बैंक मजबूत करने का प्रयास कर रही है यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक है। हिंसा और आगजनी की बढ़ती घटनाएं दर्शाती हैं कि बंगाल की कानून व्यवस्था लड़खड़ा चुकी है। अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं के दिशा निर्देश अनुसार ही कार्य करते दिखाई दे रहे हैं। ऐसी स्थिति का लाभप्रदर्शनकारी और अराजकतावादी लेते हैं। मालदा में जो हुआ वह कोई साधारण घटना नहीं। यह अराजकता की ओर बढ़ते बंगाल की झलक है। इस घटना पर भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर्दा डालने के प्रयास में चुनाव आयोग पर आरोप लगा रही है। यह बात राजनीति के गिरते स्तर को ही दर्शाती है और चिंताजनक भी है।
