लड़ते-लड़ते दोनों थक गए थे, इसलिए अस्थायी युध्दविराम

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सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }:
कई बार आम जीवन में ऐसा होता है कि दो लोग मौखिक रूप से लड़ते लड़ते थक जाते हैं तो थककर चुप हो जाते हैं।दोनों लड़ना चाहते हैं लेकिन थक गए हैं इसलिए लड़ना नहीं चाहते हैं।दोनों इसलिए नहीं लड़ना चाहते हैं कि वह शांति चाहते हैं, दोनों इसलिए नहीं लड़ना चाहते हैं कि वह पड़ोसी उऩकी लड़ाई से परेशान है।अमरीका व ईरान भी ऐसे ही ४० दिन से लड़ने वाले देश हैं। दोनों चालीस दिन से लड़ते-लड़ते थक गए हैं।दोनों को कई तरह से भारी नुकसान हुआ है। दोनों देशों की आंतरिक राजनीति में भी उऩको नुकसान होने का अंदेशा है। दोनों लड़ते-लड़ते थक गए हैं,इसलिए अभी नहीं लड़ना चाहते हैं।इसलिए दोनों अस्थायी युध्दविराम के लिए सहमत हो गए हैं।

अमरीका व ईरान के बीच यह अस्थायी युध्दविराम है, भविष्य में दोनों फिर से लड़ सकते हैं।ईरान ने तो अमरीका के सामने दस शर्ते रखी हैं। वहीं अमरीका भी ईरान के सामने कई शर्तें रखीं है। अभी दोनों लड़ना नहीं चाहते हैं इसलिए दोनों ने एक दूसरे के सामने शर्ते रखीं है और उस पर बातचीत शुरू करने सहमत हुए हैं। यानी शर्तों पर अभी कई दौर की बात होगी, दोनों के बीच जोरआजमाइश होगी। दोनों तरफ से दवाब डाला जाएगा कि उनकी शर्तें मानी जाएँ। ईरान तो कई दिनों से कह रहा है कि युध्द रुक सकता है बशर्ते अमरीकी ईरान की शर्ते मान लें। अमरीका ईरान की शर्तेे नहीं मान रहा था इसीलिए तो युध्द रुक नहीं रहा था। बातचीत शुरू नहीं हो पा रही थी।

दोनों देशों के बीच युध्दविराम के सहमति बनी है तो इसके लिए ऊपरी तौर पर पाकिस्तान का नाम भले ही लिया जाए लेकिन भीतरी तौर पर चीन की ईरान से हुई बातचीत के बात ही ईरान युध्दविराम के लिए राजी हुआ है। पाकिस्तान का तो अमरीका ने उपयोग किया है, वह खुद सीधे ईरान के साथ बात नहीं करना चाहता था इसलिए पाक के जरिए संदेश भिजवाया गया कि युध्दविराम दोनों देशों के जरूरी है,युध्दविराम होने पर शर्तों पर बात हो सकती है,चीन ने ईरान को समझाया होगा कि युध्दविराम उसके लिए जरूरी है क्योंकि जितना लंबा युध्द होगा उतना ही ज्यादा ईरान को नुकसान होगा।ईरान व अमरीका दोनों को बहुत नुकसान हो चुका है दोनों और नुकसान नहीं चाहते हैं, इसलिए दोनों को युध्द रोकने के लिए विवश होना पड़ा है।

प.एशिया में युध्द में एक तीसरा पक्ष इजराइल भी है। अमरीका युध्दविराम के लिए राजी हो गया है तो इजरायल का राजी होना स्वाभाविक है।दोनों देशों के बीच युध्दविराम पर इजरायल ने सहमति जताई है लेकिन इजराइल ने साफ कर दिया है कि लेबनान में उसके हमले जारी रहेंगे। हिजबुल्लाह के खिलाफ इजरायल की लड़ाई जारी रहेगी।हम अपने लक्ष्यों को पूरा करेेंगे,अभी कई लक्ष्य बाकी है।यानी इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह ईरान पर हमला नहीं करेगा लेकिन ईरान के पाले हुए हमास,हूती व हिजबुल्लाह को खत्म करने के लक्ष्य पर काम करता रहेगा।यह बात ईरान को देरसबेर बुरी तो लगेगी। यानी इजरायल व ईरान के बीच तनाव इस वजह से बना रहेगा। इजरायल ईरान को अपने लिए खतरा मानता है और ईरान इजरायल को अपना एक नंबर दुश्मन मानता है तो प.एशिया में अशांति तो बनी रहने वाली है।

देश में कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दल पीएम मोदी की इस बात के लिए आलोचना करेंगे कि ईरान व अमरीका के युध्द को रुकवाने उसे मध्यस्थ की भूमिका क्यों नहीं निभाई।उनको तो पीएम मोदी की आलोचना करनी है इसलिए ऐसा कहेंगे ही। कुछ दिनों व महीनों बाद उनको पता चलेगा कि पीएम मोदी ने दोनों के बीच मध्यस्तथा न करके अच्छा किया है। पीएम मोदी देश के तमाम नेताओं से राजनीति व कूटनीति में ज्यादा कुशल हैं, वह अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप को बखूबी जानते हैं कि वह अपने व देश के लिए कभी भी कुछ भी कह सकते हैं, कर सकते हैं।वह आज शांति की बात कर रहे हैं तो आज ही युध्द की बात भी कर सकते हैं।उनका भरोसा नहीं किया जा सकता। ऐसे में ट्रंप जब भी पलट जाएंगे तो उसका खामियाजा भारत को भुगतना पड़ता। होता क्या ईरान व भारत के संबंध खराब होते। जहां तक पाकिस्तान की तारीफ की बात है तो अमरीका व ईरान इसके लिए भले ही पाकिस्तान की आज सराहना करें लेकिन भविष्य में यही दोनों पाकिस्तान को बुरा बुरा कहने वाले हैं। युध्द विराम हुआ है, युध्द समाप्त नहीं हुआ है।युध्द होगा तो यह पाकिस्तान की असफलता मानी जाएगी कि वह युध्दविराम नहींं करा सका।

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