अमरीका को ना कहना भी बड़ी बात है
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: विश्व राजनीति में अमरीका का ऐसा दबदबा हुआ करता था कि उसके सहयोगी देश समेत कोई देश उसको ना कहने की हिम्मत नहीं करता था.अमरीका ने जाे कह दिया उसे मानना पड़ता था,मजबूरी में मानना पडता था।अमरीका जो कह देता था,वही ठीक माना जाता था, वही सच माना जाता था। वह कई देशों का रक्षक होने के साथ ही विश्व शांति व विश्व में लोकतंत्र का भी रक्षक माना जाता था।वह जो कुछ करता था, उसे विश्व शांति,विश्व में लोकतंत्र की स्थापना व मजबूती के लिए किया काम माना जाता था। इसकी आड़ में चाहे वह किसी देश की चुनी हुई सरकार का तख्ता पलटवा दे। किसी देश में सैन्य कार्रवाई कर दे।सुप्रीम लीडर की हत्या करवा दे। किसी देश के राष्ट्रपति को रातो रात पकड़कर अमरीका ले आए।पहली बार विश्व इतिहास में ऐसा हुआ कि अमरीका ने चीन सहित नाटो देशों से अमरीका ने सहयोग करने को कहा लेकिन सबने ना कह दिया और यह पहली बार हुआ कि कई देशों ने अमरीका काे ना कहा है।
अमरीका अब तक जो ठीक समझता है, वह करता आया है और अकेले करता आया है।डंके की चोट पर करता आया है।ट्रंप ने सोचा था जैसा और अमरीकी राष्ट्रपति करते आए हैं,वह भी कर सकते हैं लेकिन वह भूल गए कि अमरीका के दूसरे राष्ट्रपतियों व उनमें जो फर्क है,वह फर्क उन्होंने खुद पैदा किया है। पहले के राष्ट्रपति खुल हाथ से सहयोगी देशों को पैसा देते थे,उनकी सुरक्षा के लिए पैसा खर्च करते थे।उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता देते थे,अमरीकी सुरक्षा छतरी के नीेचे किसी देश के होने के मतलब होता था कि उसकी सुरक्षा की गारंटी है। यानी कोई देश उन पर हमला नहीं कर सकता।ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए पैसा खर्च करने से मना कर दिया है।उल्टे उनसे पैसा खर्च करने को कह रहा है, टैरिफ लगाकर उनसे पैसा वसूलने का काम कर रहा है।यह बात विश्व के सारे देशों को नागवार गुजरी है और यही वजह है कि अब वह अमरीका से अलग अपना हित किसमें है, यह देख रहे हैं और वैसे फैसले कर रहे हैं।
अमरीका के विश्वव्यापी दबदबे के वहम में ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य हमले का फैसला करते वक्त अन्य देशों के साथ व्यापक कूटनीति समन्वय से दूरी बनाए रखी यानी सहयोगी देशों से इस मामले में बात तक नहीं की,उनसे राय तक नहीं ली और सैन्य कार्रवाई को जरूरी मानते हुए कार्रवाई कर दी।सैन्य कार्रवाई के पहले राजनयिक तैयारी की जाती है, वह भी नहीं की गई। आज जब भी दुनियां में कही भी युध्द होता है तो उसके आर्थिक व भू-राजनीतिक परिणाम होते है यह जानते हुए ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने का जोखिम उठाया और मान लिया कि इसके लिए विश्व के देश उनकी वाहवाही करेंगे।ऐसा नहीं हुआ है। कई देश ईरान में सैन्य कार्रवाई को गलत बता रहे है,अमरीका की ऐसी गलती बता रहे हैं जिससे दुनिया के ज्यादातर देशों को कई तरह की परेशानी हो रही है।
ईरान पर सैन्य हमले के बाद आज जब आर्थिक व भू-राजनीतिक परिणाम सामने आ रहे हैं तो ट्रंप को एहसास हो रहा है कि अब स्थिति को संभालना उनके बस की बात नहीं रह गई है,खासकर होर्मूज स्ट्रेट में ईरान की नाकेबंदी के कारण गैस,तेल की आवाजाही बंद होने का असर अमरीका सहित पूरी दुनिया पर बुरा पड़ रहा है।सभी देशो में पेट्राेल डीजल के दाम बढ़ गए हैं। इसे कम करना अमरीका के अकेले के बस की बात नहीं है। यह दाम तब ही कम हो सकते हैं जब होर्मूज स्ट्रेट से गैस,तेल की सामान्य आवाजाही हो। गैस तेल की आवाजाही को अमरीका अकेले सामान्य नहीं कर सकता आज अमरीका को इस बात का एहसास हो रहा है यही वजह है कि चीन सहित जर्मनी,स्पेन, आस्ट्रेलिया,जापान,ब्रिटेन आदि देशों से सहयोग करने यानी होर्मूज स्ट्रेट की सुरक्षा के लिए युद्धपोत भेजने का कहा तो किसी देश ने हां नहीं कहा।सभी ने ट्रंप को सहयोग करने से मना कर दिया और साफ कह दिया कि वह इस युध्द में शामिल नहीं होंगे।
इस पर नाराज ट्रंप ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि उन्होंने सात देशों से होर्मूज स्ट्रेट की सुरक्षा के लिए युध्दपोत भेजने को कहा था ताकि वैश्विक तेल प्रवाह न रुके।उन्होंने कहा था कि मैं उन देशों से मांग करता हूं कि वे आगे आएं और अपने क्षेत्र की सुरक्षा करें क्योंकि यह उनका क्षेत्र है।यही नहीं ट्रंप होर्मूज स्ट्रेट खलुवाने के लिए चीन पर भी दवाब डाल रहे हैं।उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा है कि पं.एशिया के तेल पर चीन की निर्भरता का मतलब है कि उसे उस नए गठबंधन की मदद करनी चाहिए जिसे वह तेल टैंकरों की होर्मूज स्ट्रेट से आवाजाही फिर से शुरू कराने की कोशिश में आगे बढा रहे हैं।उन्होंने कहा है कि हम चीन दौरे से पहले यह जानना चाहते हैं कि क्या बीजिंग मदद करेगा। बीजिंग मदद नहीं करता है तो हम चीन का दौरा टाल सकते है। ज्ञात हो कि ट्रंप का ३१ मार्च से २ अप्रैल तक चीन का दौरा निर्धारित है।मध्य पूर्व के देश चाहते हैं कि जल्द युध्द विराम हो लेकिन खामनेई के मारे जाने के बाद,जूनियर खामनेई के घायल होने, लारिजानी व सुलेमानी के मारे जाने से स्थिति और बिगड़ गई है,युध्द से सिर्फ नुकसान हो रहा है और सबको नुकसान हो रहा है फिर भी जो देश युध्द में फंसे हुए उनके निकलने की जल्द कोई उम्मीद तो दिखती नहीं है।
