यकीन हो गया है कि सरेंडर नहीं किए तो मारे जाएंगे
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: चाहे छत्तीसगढ़ के नक्सली हों या आसपास के राज्य के नक्सली हों या उनके सबसे बड़े नेता उनको अमित शाह की नकसलियों की सफाया नीति पर प्रभावी अमल से यकीन हो गया है कि वह सरेंडर नहीं करेंगे तो मारे जाएंगे।यही वजह है कि पिछले एक दो साल में कई बड़े नेताओं ने सरेंडर किया ताकि वह जिंदा रहें।जिन बड़े नेताओं ने सरेंडर नहीं किया वह सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए हैं। बड़े बड़े नेताओं के मारे जाने के कारण ही नक्सलियों में पहली बार मारे जाने का खौफ पैदा हुआ है। जब बड़े नेता मारे गए तो निचले स्तर के नक्सली नेताओं को एहसास हुआ कि जब बड़े नेता अपनी रक्षा नहीं कर पा रहे हैं तो हमारी रक्षा क्या करेंगे और मारे जाने के खौफ से ही जितने नक्सली मारे गए हैं, उससे ज्यादा नक्सलियों ने सरेंडर किया है। अमित शाह की यह बड़ी सफलता है कि पहले किसी क्षेत्र में नक्सलियों का खौफ हुआ करता था आज दो साल में स्थिति यह हो गई है कि क्षेत्र के नक्सलियों में मारे जाने का खौफ है।
अमित शाह ने नक्सलियों में मारे जाने का जो खौफ पैदा किया है, वह इससे पहले किसी राज्य या देश के किसी गृहमंत्री ने पैदा नहीं किया था। राज्यों के कितने ही गृहमंत्री आए गए,देश के कितने ही गृहमंत्री आए गए लेकिन कोई नक्सलियों में मारे जाने का खौफ पैदा नहीं कर सका था।वे सब मानते ही नहीं थे कि नक्सलियों में मारे जाने का खौफ पैदा किया जा सकता है इसलिए वह ऐसा कोई तरीका सोच भी नहीं पाए। अमित शाह से तय कर लिया कि इतने समय में नक्सलियो का सफाया करना है तो योजना बनाई कि कैसे नक्सलियों का उनके गढ़ में घुसकर मारा जा सकता है। सुरक्षा बलों की संख्या को नक्सलियों से ज्यादा किया। इससे सुरक्षा बलों ने नक्सलियों को घेर कर मारना शुरू किया। कई बड़े नेताओं को घेर कर मार गिराया। इससे एक ओर तो सुरक्षा बलों में भरोसा पैदा हुआ कि हम नक्सलियों का मार सकते हैं और नक्सलियों में डर पैदा हुआ कि अब उनका कोई भी ठिकाना सुरक्षित नहीं है और वह कभी भी मारे जा सकते हैं।
अगर अमित शाह ने नक्सलियों में यह खौफ पैदा न किया होता कि वह सरेंडर नहीं करेंगे तो कभी भी, कहीं भी मारे जा सकते हैं, नक्सलियों की संख्या बस्तर सहित कई राज्यों मेें कम नही हुई होती।नक्सलियों की संख्या बस्तर में कम होने के साथ ही आसपास के राज्यों में भी कम होती गई है तो छत्तीसगढ़ सहित भाजपा शासित राज्यो में नक्सलियों के मारे जाने के कारण और सबसे ज्यादा सरेंडर करने के कारण कम हो गई है।नक्सलियों की संख्या कम होने के कारण बड़े नेताओं के सामने भी स्थिति यह हो गई थी कि वह कुछ करने की स्थिति में नहीं रह गए थे। क्योंकि कुछ करने के लिए आदमियों की जरूरत होती है। वह न पहले जैसे हमला कर पा रहे थे, न नए सदस्य भर्ती कर पा रहे थे, न कहीं ट्रेनिंग दे पा रहे थे, उनके सुरक्षित ठिकाने नष्ट कर दिए गए तो बड़े नेताओं को लगा कि जान तो उनकी अब किस राज्य में बच नहीं सकती उनके सामने भी सरेंडर करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है. यही वजह है कि सबसे बड़े नक्सल नेता देवजी को भी सरेंडर करना पड़ा है।
बसवा राजु,माडंवी हिड़मा,चलपति,प्रयाग मांझी,मोडेम बालाकृष्णा,रामचंद्र रेड्डी उर्फ राजू दादा,सत्यनारायण रेड्डी उर्फ कोसा दादा, गणेश उइके,जगदीश सुधाकर आदि सरेंडर नहीं करने के कारण मारे जा चुके है,देवजी के सरेंडर करने के बाद अब माना जा रहा हैकि मिसीर बेसरा,व गणेश सहित गिनती के लोग ही बचे हैं। इससे नक्सली संगठन अब नाम को ही बचा है। जहां कहीं नक्सली गिनती के बचे हैं, वह भी सरकार को पत्र लिखकर कह रहे हैं कि वह सरेंडर करना चाहते हैं। बीबीेेएम के बचे हुए १५ सदस्यों ने गृहमंत्री विजय शर्मा को पत्र लिखकर बताया है कि उन्हें सुरक्षा की गारंटी दी जाए तो वह सरेंडर करना चाहते हैं।अगर यह सरेंडर होता है तो महासमुंद जिला नक्सलमुक्त घोषित किया जा सकता है।राजनांदगांव रेंज में महाराष्ट्र,मप्र,छत्तीसगढ़ जोन(एमएमसी जोन)के माओवाद प्रभावित जिले दिसंबर में ही नक्सलमुक्त हो गए हैं।इसमें खैरागढ़,छुईखदान,गंडई,राजनांदगाव, कबीरधाम जिला शामिल हैं।
नक्सलियों के मारे जाने व सरेंडर किए जाने से उम्मीद की जा सकती है कि जहां भी नक्सली बचें है, उन तक बड़े नेताओं के सरेंडर करने से यह संदेश तो पहुंच रहा है कि मारे जाने से अच्छा है कि सरेंडर करना क्योंकि नक्सली संगठन बचा भी रहता है तो आज वह ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह कहीं कुछ कर सके क्योंकि उसके पास न पैसा है और न ही पहले जैसा संगठन। जो नक्सली नेता सरेंडर करता है तो वह यही कहता है कि बदलते सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक हालात मे सशस्त्र संघर्ष जारी रखने का कोई औचित्य नहीं रह गया है वह अब संविधान के दायरे में रहकर काम करना चाहते हैं। जब अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे की तारीख बताई थी को बहुत कम लोगों को लगता था कि ऐसा हो पाएगा लेकिन अब जब इस तारीख को कुछ दिन बचे हैं तो ज्यादातर लोगों को लगता है कि २६ मार्च के पहले ही नक्सलवाद का खात्मा मोटे तौर हो जाएगा।जो अब तक असंभव माना जाता था वह अब संभव लगता है लोगों को।
