एनीमिया: खामोश स्वास्थ्य संकट

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डॉ. अनिल सूद MD, FIAP, FICMCH
संपादकीय { गहरी खोज }: वैश्विक एनीमिया दिवस हर साल 13 फरवरी को मनाया जाता है। यह दिन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस ‘मूक महामारी’ के प्रति एक चेतावनी है, जो हमारी भावी पीढ़ी को अंदर ही अंदर खोखला कर रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं- दुनिया की लगभग एक चौथाई आबादी, यानी करीब 2 अरब लोग एनीमिया की चपेट में हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या उन मासूम बच्चों की है, जिनके कंधों पर भविष्य की जिम्मेदारी है।

भारत के परिप्रेक्ष्य में यह स्थिति और भी गंभीर है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़े बताते हैं कि देश में 5 वर्ष से कम उम्र के 58.5 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से ग्रस्त हैं। यानी हमारे हर दूसरे बच्चे के शरीर में खून की कमी है। चिकित्सकीय भाषा में इसे हीमोग्लोबिन या लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) की कमी कहा जाता है, जिससे शरीर के अंगों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। लेकिन सामाजिक दृष्टि से देखें, तो यह हमारे बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर लगा एक बड़ा ‘ब्रेक’ है।

एनीमिया का सबसे प्रमुख कारण आयरन की कमी है, और विडंबना यह है कि यह एक ऐसी समस्या है जिसे आसानी से रोका जा सकता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में घर के पौष्टिक भोजन की जगह पैकेटबंद जंक फूड ने ले ली है। हरी पत्तेदार सब्जियों और पारंपरिक अनाज की थाली से दूरी ने बच्चों को कमजोर बना दिया है। इसके अलावा, स्वच्छता की कमी और कृमि संक्रमण भी इसके बड़े कारण हैं।

इसका असर भयावह है। एक एनीमिक बच्चा स्कूल में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता, वह जल्दी थक जाता है और उसका बौद्धिक विकास पिछड़ जाता है। गर्भवती महिलाओं में यह समस्या जन्म के समय कम वजन और यहां तक कि मातृ मृत्यु दर के जोखिम को भी बढ़ा देती है।

सरकार ‘एनीमिया मुक्त भारत’ अभियान के जरिए आयरन की गोलियां और जागरूकता फैला रही है, लेकिन यह लड़ाई सिर्फ सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं जीती जा सकती। हमें अपनी रसोई और जीवनशैली में बदलाव करना होगा। बच्चों की डाइट में आयरन युक्त बीन्स, हरी सब्जियां और फोर्टिफाइड अनाज के साथ-साथ विटामिन-सी (नींबू, टमाटर) को शामिल करना अनिवार्य है। विटामिन-सी शरीर में आयरन को सोखने में मदद करता है। साथ ही, जंक फूड के प्रति कठोरता और नियमित डिवार्मिंग (पेट के कीड़ों की दवा) बेहद जरूरी है।

एनीमिया कुपोषण का ही एक रूप है। एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए जरूरी है कि हम इस खामोश दुश्मन को पहचानें और अपनी थाली में सेहत को वापस लाएं।

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