खाते में नगद पैसा किसकाे बुरा लगता है…
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: कहावत है कि घर आई लक्ष्मी को कौन ठुकराता है। घर आई लक्ष्मी का तो हर कोई स्वागत करता है और उम्मीद करता है कि ज्यादा से ज्यादा लक्ष्मी घर आनी चाहिए। जनता के खाते जितना नगद पैसा आता है उसको भी उतना ही अच्छा लगता है। अब तो अच्छी सरकार वही मानी जाती है जो जनता की जेब में ज्यादा नगद पैसा डालती है। वह जमाना गया जब सरकार जनता को योजना बनाकर फायदा पहुंचाया करती है। अब तो डिजिटल युग है,दिल्ली से या राज्य की राजधानी से नगद पैसा डालो और वह सीधे जनता के खाते में पहुंच जाता है। खाते मे पैसा आता है जनता को अच्छा लगता है, सरकार को भी यह बताते हुए अच्छा लगता है कि उसने कितने महिलाओं के खाते में कितना पैसा डाला है। किसानों के खाते में कितना पैसा डाला है,मजदूरों के खाते में कितना पैसा डाला है।सरकार हर महीने पैसा जनता के खातों में डालती रहती है और अच्छी सरकार बनी रहती है।
जो दल सत्ता में है वह इसलिए पैसा खातों में डालता रहता है कि चुनाव के दौरान वादा किया गया था।जनता ने उनके वादे पर यकीन कर सत्ता सौंपी है तो वादा तो पूरा करना पड़ेगा। वादा पूरा नहीं किया नहीं किया को अगली बार जनता सत्ता से बाहर कर देगी। एक बार सत्ता में आने के बाद कोई राजनीतिक दल सत्ता से बाहर नहीं जाना चाहता है इसलिए जो सत्ता में हैं, वह सत्ता में रहने के लिए जनता को पैसा देते रहते हैं और जो लोग सत्ता में फिर से आना चाहते हैं वह चुनाव के पहले जनता से फिर वादा करते हैं कि वह सत्ता में आए तो और कितना पैसा जनता के खाते में डालेंगे।तमिलनाडु में द्रमुक की सरकार है, वह सत्ता में रहते तो जनता के खाते में सहायता के नाम पर पैसा डाल रही है।
इसी साल चुनाव है फिर से सत्ता में आना है इसलिए मंत्री ने चुनाव के पहले महिलाओं को बता दिया कि सरकार ने उनके खाते में एकमुश्त पांच हजार रुपए डाल दिए हैं। इसमें तीन हजार रुपए तीन माह की मासिक सहायता है और दो हजार रुपए ग्रीष्मकालीन विशेष पैकेज के रूप में दिया गया है। पं.बंगाल में सरकार युवाओं को युवा साथी नगद योजना के तहत शिक्षित बेरोजगारों को १५०० रुपए देने की याेजना बनाई है। बिहार में सरकार ने इसी तरह महिलाओं के खाते में एक मुश्त दस हजार रुपए चुनाव के पहले डाले थे तो कांग्रेस सहित विपक्ष के नेताओं ने इसका विरोध किया था।अब विपक्ष शासित राज्य तमिलनाडु व पं. बंगाल में वही किया जा रहा है तो विपक्ष के किसी नेता यह बुरा नहीं लग रहा है।
जनता को नगद पैसा देना राजनीतिक दलों को बुरा नहीं लगता है हर राजनीतिक मानता है कि सत्ता हासिल करनी है तो जनता को नगद पैसा देना होगा। जनता को नगद पैसा देने पर ही चुनाव में जीत मिलती है। कई राज्यों में राजनीतिक दलों को जीत मिली है इसलिए जो राजनीतिक दल सत्ता में है वह राजनीतिक चुनाव जीतने के लिए जनता से नगद पैसा देने का वादा कर रहे हैं।तमिलनाडु सरकार का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो जिसमें राज्य सरकार जनता को चुनाव के पहले मुफ्त बिजली देना चाहती है तो सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार सहित सभी राज्य सरकारों को फटकार लगाई है कि इस तरह मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली देते रहेंगे तो विकास के लिए पैसा कहां से बचेगा।सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को याद दिलाया है कि देश के ज्यादातर राज्य तो पहले से घाटे में है। फिर भी विकास को छोड़कर मुफ्त सुविधाएं और नगद पैसे बांट रहे हैं।जो लोग भुगतान नहीं कर सकते उन्हें सहायता देना समझ मे आता है लेकिन अमीर गरीब में फर्क किए बिना सबको मुफ्त सुविधा देने गलत नीति है।
यह बात तो राजनीतिक दल भी जानते हैं लेकिन उनको चुनाव के पहले सबका वोट चाहिए इसलिए वह सबको देने का वादा करते हैं, चुनाव के बाद वह नियम व शर्ते लगाकर लोगों की संख्या कम करने का प्रयास करते हैं। .ऐसा कई राज्यों में हो चुका है। फिर भी जिन लोगों को नगद पैसा मिलता है, उनकी संख्या लाखों से लेकर एक दो करोड़ तो होती ही है। यह सच है कि इससे राज्य का विकास प्रभावित होता है लेकिन यह भी सच है कि राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद खूब भ्रष्टाचार करते है अपने लिए, परिवार के लिए और पार्टी के लिए भी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट फटकार लगाता है तो लगाते रहे राजनीतिक दलों को पहले इस तरह की फटकार का कोई असर हुआ है और न भविष्य में होने वाला है।
