चीनी दल भाजपा-आरएसएस से मिला, कांग्रेस सह नहीं पाई
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: विश्व राजनीति में आपसी संवाद,आपसी समझ बढ़ाने के लिए, एक दूसरे के दल व उनकी कार्यशैली को जानने, समझने, उनकी विचारधारा क्या है,उनका लक्ष्य क्या है, यह सब जानने के लिए एक देश का प्रतिनिधिमंडल दूसरे देश जाता है,दूसरे देश का प्रतिनिधिमंडल उस देश में आता है। आपस में मिलने जुलने से, बात करने से एक दूसरे को समझने में आसानी होती है। जो दूरी रहती है, वह कम होती है। इससे दो देशों के संबंध सुधरते हैं, उनके कई स्तरों पर संबंध मजबूत होते हैं। नीति नियम बनाने में सुविधा होती है, अल्पकालिक व दीर्घकालिक नीति बनाना आसान होता है। यही वजह है कि भारत में कई देशों के प्रतिनिधिमंडल आते रहते हैं और भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी दूसरे देश जाता रहता है। यह दो देशों के बीच एक सामान्य प्रक्रिया है।
इस सप्ताह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी(सीपीसी) प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को दिल्ली में भाजपा नेतृत्व से मुलाकात की बात की। इसके बाद मंगलवार को चीनी प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिल्ली स्थित मुख्यालय में आरएसएस के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की तो इस मुलाकात पर कांग्रेस की जो प्रतिक्रिया आई है उससे साफ हो जाता है कि कांग्रेस को यह सहन नहीं हो रहा है कि चीनी प्रतिनिधिमंडल भाजपा से कैसे मिल सकता है.चीनी प्रतिनिधिमंडल आरएसएस नेताओं से कैसे मिल सकता है, दोनों विचारधारा के स्तर पर एक दूसरे के उलट हैं। भाजपा वाले वामपंथियों के पसंद नही करते हैं,इसी तरह वामपंथी दक्षिणपंथी भाजपा काे पसंद नहीं करते हैं। चीन के साथ एमओयू करने वाली कांग्रेस के लिए यह बड़़ा झटका है कि यह क्या हो रहा है, जो हो नही सकता, कैसे हो रहा है। चीन ने एमओयू कांग्रेस से किया है और उसके दल के नेता भाजपा से नजदीकी बढ़ा रहे हैं, संवाद कर रहे हैं।
कांग्रेस चीनी प्रतिनिधिमंडल व भाजपा,आरएसएस नेताओं के आपस में मुलाकात करने को यूं पेश कर रही है कि जैसे यह संभव नहीं था और संभव हुआ है तो देश के खिलाफ कोई साजिश है। चीनी प्रतिनिधिमंडल के भारत आने व यहां सत्तारूढ़ दल उससे संबंधित दलों से मिलने के पीछे की सच्चाई कांग्रेस बखूबी जानती है लेकिन वह जानबूझकर देश के लोगों को बता नहीं रही है कि यह जो चीनी प्रतिनिधिमंडल भारत आया है और यहां भाजपा व आरएसएस नेताओं से मिल रहा है तो उसके मूल में वह समझौता है जो कांग्रेस के शासन समय १९८६ में किया गया था और तब राजीव गांधी पीएम थे। इस समझौते के तहत एक बार चीनी प्रतिनिधिमंडल भारत आएगा तो बदले में एक बार भारत का प्रतिनिधिमंडल चीन जाएगा। राजीव गांधी के समय हुए समझौते के तहत ही चीनी प्रतिनिधिमंडल भारत आया हुआ है और वही काम कर रहा है जो कांग्रेस के समय किया करता था। इस तरह के १२ प्रतिनिधिमंडल अब तक भारत आ चुके हैं और भारत से भी चीन जा चुके हैं।
कांग्रेस को चीनी प्रतिनिधिमंडल की भाजपा व आरएसएस नेताओं से मुलाकात से खूब मिर्ची लगी है। इसका पता कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा के बयान से लगता है जिसमें उन्होंने कहा है कि यह भाजपा का चीन के सामने आत्मसमर्पण है।चीन के साथ अपने व्यवहार से मोदी सरकार के पाखंड ने भारत की विदेश नीति को उलझा दिया है।उन्होंने आरोप लगाया है कि भाजपा के लाख आंख के दावे सीपीसी की लाल सलाम में बदल गए हैं।असली सवाल तो यह है कि चीनी दल के लोगों व के बैठकों में बात क्या हुई है।आरएसएस के अनुसार चीनी प्रतिनिधिमंडल आरएसएस के संगठन व उसके कामकाज के बारे में जानने के लिए उत्सुक था।हमने उन्हें अपने सौ साल के सफर,समाज में अपने काम अपने दृष्टिकोण के बारे में विस्तार से बताया है। यह शिष्टाचार बैठक थी, बैठक का कोई तय एजेंडा नहीं था।
सीसीपी प्रतिनिधियों का संघ मुख्यालय तक आने को दोनों देशों के बीच निकटता बढ़ाने का संकेत माना जा रहा है। होने को यह मुलाकात सीसीपी नेताओं की इच्छा पर हुई है और इसका उद्देश्य शिष्टाचार निभाना था। लेकिन दो देशों की कूटनीति में शिष्टाचार का भी एक संदेश होता है।इससे संकेत मिलता है कि चीन भारत को केवल सरकारी का कूटनीतिक चैनलों से नहीं अपितु वैचारिक व सामाजिक स्तर पर भी समझना चाहता है,दोनों देशों के बीच अंतरदलीय संवाद भी बढ़ाना चाहता है।यह भी संकेत है कि दोनों देश अब केवल सरकारी स्तर पर नहीं राजनीतिक दलों के स्तर पर भी संवाद को संस्थागत रूप देना चाहते हैं। ऐसे संबंध अब तक कांग्रेस से ही थे, अब कांग्रेस सत्ता में नहीं है तो भाजपा से बनाने की कोशिश की जा रही है, इसी बात से कांग्रेस को तीखी मिर्ची लगी हुई है और वह चिढ़ी हुई चीन से है और गुस्सा भाजपा आरएसएस पर निकाल रही है।
