भ्रष्टाचार तो अब और गंभीर समस्या बन चुका है
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: आजादी के बाद भ्रष्टाचार कोई गंभीर समस्या नहीं था। लेकिन आजादी के बाद के दशकों में यह गंभीर समस्या होता चला गया है क्योंकि राजनीति में पहले जो लोग सेवा के लिए आते थे अब भ्रष्टाचार कर पैसा कमाने के लिए आने लगे। धीरे धीरे सेवा का भाव तो खत्म हो गया है आज तो ज्यादातर लोग राजनीति में पैसा कमाने के लिए आते हैं, उनको लगता है कि राजनीति में आकर पैसा कमाना बहुत आसान है, हमारी पार्टी की सरकार बन गई तो हम जितना चाहे भ्रष्टाचार कर सकते हैं और जितना चाहे उतना पैसा कमा सकते हैं।पहले तो सौ सरकारी कर्मियों, सौ नेताओं में इक्का दुक्का भ्रष्ट होते थे, उनको अच्छी नजर से देखा नहीं जाता था, उनको समाज में इज्जत नहीं मिलती थी। आज तो सौ में ९० सरकारी कर्मी व नेता भ्रष्ट माने जाते हैं और सिंडीकेट बनाकर भ्रष्टाचार करने के कारण भ्रष्ट लोगों को कोई बुरा नहीं कहता है,वह होशियार माने जाते है और अब तो १० प्रतिशत ईमानदार लोगों को बेवकूफ समझा जाता है कि उसे मौका मिल रहा है और वह भ्रष्टाचार नहीं कर रहा है।
जहां तक सरकारी सिस्टम व सरकार के स्तर पर होने वाला भ्रष्टाचार है इसे रोक पाना किसी एक ईमानदार सीएम के लिए आसान नहीं है क्योंकि सरकारी सिस्टम हो या सरकार के स्तर पर होने वाले काम हों, अफसर,कर्मचारी से लेकर मंत्री तक पैसा कमाने का कोई न कोई मौका तलाश लेते हैं। भ्रष्टाचार जब बहुत से लोग सामूहिक रूप से करते हैं तो उसे पकड़ना और मुश्किल होता है। क्योंकि जिन पर भ्रष्टाचार रोकने की जिम्मेदारी होती है वही भ्रष्टाचार करते है, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं तो भ्रष्टाचार रुक कैसे सकता है।जब किसी सरकार का मुखिया किसी को इसलिए बनाया जाता है कि वह पार्टी को दो चार हजार करोड़ रुपए राज्य से जुटाकर देगा तो मुखिया अपने घर से तो इतना पैसा नहीं देता है, वह राज्य के पैसा में संगठित रूप से भ्रष्टाचार कर पार्टी को देता है। साथ ही अपने परिवार के लिए पैसा निकालता है तो ऐसे में राज्य मे एक के बाद घोटाले सामने कैसे नहीं आएंगे।
ऐसे मुखिया के रहते तो राज्य में भ्रष्टाचार शिष्टाचार,नवाचार बन जाता है तो उसके बाद आने वाले मुखिया के लिए भ्रष्टाचार को रोकना और मुश्किल हो जाता है। खासकर उस मुखिया के लिए भ्रष्टाचार रोकना मुश्किल हो जाता है जो भ्रष्टाचार नहीं होने देने की बात भी करता है और ऐसे उपाय भी करता है कि भ्रष्टाचार न हो सके।भ्रष्टाचार करने वालों पर कार्रवाई हो। पांच साल में तंत्र को भ्रष्टाचार करने की आदत हो जाती है तो उसे सुधारने मेंं वक्त तो लगता है,भ्रष्टाचार भी शेर के मुंह में खून लग जाने के समान होता है, एक बार आदत हो जाए तो मौका मिलते ही भ्रष्टाचार करने वाले कहां चूकते हैं। नए नए तरीके से भ्रष्टाचार करते हैं।पांच साल में एक मुखिया जितना भ्रष्टाचार को बढ़ा सकता है, दूसरा मुखिया पांच साल में उसे कम नहीं कर सकता क्योंकि बीमारी होती जल्दी है, उसके उपचार में वक्त लगता है।
भ्रष्टाचार में बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी पकड़े जाते हैं तो सरकार के सामने यह समस्या तो आती है कि वह कार्रवाई करेगी तो शासन चलाने में दिक्कत होगी।इसी वजह से आजादी के बाद यह व्यवस्था यह व्यवस्था की गई कि सरकारी कर्मचारी या अफसरों पर भ्रष्टाचार का मामला चलाने के लिए सरकार से अऩुमति लेनी होगी।इसे लेकर जैसे लोगों में मतभेद हैं उसी तरह का मतभेद जजों में भी सामने आया है। दो जजों की पीठ के सामने यह मामला आया कि अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच से पहले अनुमति लेना ठीक है या गलत है तो एक जज विश्ननाथन ने कहा है कि धारा १७ ए संवैधानिक रूप से वैध है उनका कहना है कि जब तक ईमानदार को तुच्छ जांच से बचाया नहीं जाता तब तक नीतिगत गतिरोध उत्पन्न हो जाएगा। लोकसेवकों को दुर्भावनापूर्ण मामलों में बचाने की आवश्यकता है। दुरुपयोग की संभावना धारा १७ ए को रद्द करने का आधार नहीं है।
धारा१७ ए के मामले में दूसरी जज नागरत्ना का कहना है कि यह प्रावधान भ्रष्ट लोगों को बचाने का प्रावधान है।यह धारा असंवैधानिक है,इसे निरस्त किया जाना चाहिए।इसके लिए किसी पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।भ्रष्टाचार के मामले में जांच के लिए पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत है,यह जांच को बाधित करती है तथा ईमानदार व सत्यनिष्ठ लोगों की रक्षा करने की जगह भ्रष्ट लोगों को संरक्षण प्रदान करती है जिन्हें वास्तव में किसी संरक्षण की जरूरत नही है।दो जजों की बेंच तो धारा १७ ए के मामले में कोई साफ फैसला नहीं कर सकी है। यानी इसके लिए और बडी बेंच का गठन किया जाएगा। इस देश में भ्रष्टाचार को रोकना है तो उसको कानून का संरक्षण देकर नहीं रोका जा सकता क्योंकि अब तो सरकार पर ही आरोप लग रहे हैं कि उसने पांच साल में पार्टी फंड के लिए, चुनाव के लिए भ्रष्टाचार किया है।
