कुत्तों के बारे में सबके अनुभव हो सकते हैं अलग-अलग

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सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }:
यह तो सब जानते हैं कि कुत्ते बहुत वफादार होते हैं। वफादार कुत्ते कोई समस्या नहीं रहे कभी, वह तो गर्व का विषय होते हैं कि देखो हमारे घर का कुत्ता कितना वफादार है। घर के कुत्ते वफादार होते हैं, इसलिए घर वालों के लिए कोई समस्या नहीं होते हैं, बाहर वालों के लिए कभी कभी समस्या होते है। वफादारी साबित करने के लिए घर के कुत्तों को भौंकना पड़ता है और आदमी न डरे तो उसे काटना भी पड़ता है। घर के कुत्ते कभी कभार ही किसी को काटते हैं, इसलिए वह इतनी बड़ी समस्या नहीं बने हैं कि उन पर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो। समस्या तो घर के बाहर के कुत्ते हैं, मोहल्ले के कुत्ते हैं, नगर निगम क्षेत्र के कुत्ते हैं, शहर के कुत्ते हैं।एक तो वह वफादार नही होते हैं,दूसरे शहर के कुत्ते होकर भी शहर के लोगों को काटते हैं।शहर के लोगों को ही काटते हैं इसलिए वह हर शहर के लिए समस्या हो गए हैं। इतनी बड़ी समस्या हो गए हैं कि उन पर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही है कि इस समस्या का समाधान कैसे किया जाए, क्या किया जाए।
आंकड़ों के मुताबिक हमारे प्रदेश में तीन लाख आवारा कुत्ते हैं,वहीं रायपुर नगर निगम में इनकी संख्या ४५ हजार के आसपास है।निगम हर साल कुत्तों की संख्या कम करने के लिए एक करोड़ रुपए खर्च करता है। कुत्तों की संख्या कम होगी तो वह लोगों को काटेंगे कम।आंकड़ों के मुताबिक रायपुर में रोज ३०-३५कुत्ते किसी न किसी को कहीं न कहीं काट लेते है। साल २०२४ में अंबेडकर अस्पताल में २८३२ डाग बाइट के केस आए थे,यह आंकड़ा २०२३ में १९२९ था यानी हर साल ज्यादा कुत्ते ज्यादा लोगों को काटते हैं।सुप्रीम कोर्ट का यह कहना सच हो सकता है कि आवारा कुत्तों के मामले में नगर पालिकाओं ने कुछ नहीं किया लेकिन यह बात नगर निगम के लिए भी सच हो सकती है।चाहे नगरपालिका हो या नगरनिगम वह किसी भी राज्य के हों उनका आचरण एक जैसा होता है,कहने को वह कहते हैं हम बहुत कुछ करते हैं। जैसे रायपुर निगम अभी एक करोड़ रुपए कुत्तों की संख्या कम करने के लिए खर्च करता है लेकिन इसका परिणाम यह तो होता नहीं है कि निगम क्षेत्र में डाग बाइट की संख्या कम हुई है। निगम कितने भी करोड़ खर्च करे और लोगों को कुत्ते काटे तो लोगों को यही लगेगा कि निगम कुछ नहीं करता है। कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के नगरपालिका ने कुछ नहीं किया कहने का यही मतलब है।
कुत्तों के काटने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जज विक्रम नाथ की यह टिप्पणी सच हो सकती है कि कुत्ते सूंघ कर पता लगा लेते हैं कि कौन व्यक्ति डरा हुआ है और डरे हुए व्यक्ति को काटते हैं।एक बार काटे हुए व्यक्ति को इसीलिए बार बार काटते हैं कि वह कुत्तों को देखकर डर जाता है।यह भी संभव है कि कुत्तों के काटने के मामले में अलग अलग राज्यों के लोगों अनुभव अलग अलग हो।कुछ लोग कह सकते हैं मैं तो कुत्तो से डरता नहीं हूं फिर भी मुझे काट लिया। कई लोग कह सकते हैं कि हमने तो कुत्तों को डराने का प्रयास किया तो उन्होंने काट लिया।कुछ लोग कह सकते हैं कि रात में अकेले देखकर कुत्ते डराते हैं, कुत्ते संख्या में ज्यादा हों तो आदमी तो डरेगा ही।जिसको एक बार कुत्ता काट ले तो वह तो कुत्तों से डरेगा ही कि कहीं फिर न काट ले।सुप्रीम कोर्ट के जज के हिसाब से तो कुत्ता काटता है तो उसके लिए आदमी दोषी है,वह कुत्तों को देखकर डरता क्यों है। नही डरेगा को कुत्ता नहीं काटेगा, नहीं भागेगा तो नही काटेगा।
हम भारत के लोग कुत्तों के काटने पर भी कुत्तों से बहुत प्यार करते हैं।सुप्रीम कोर्ट ने कुत्तों को सड़क से हटाने का फैसला सुनाया तो बहुत सारे डाग लवरों ने उसका विरोध किया, कहा यह तो कुत्तों के साथ अन्याय है, देश में लावारिस कुत्तों की हमलाें की बढ़ती संख्या और उससे उत्पन्न जनसुरक्षा के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए गुरुवार को स्पष्ट किया कि उसने सड़क से हर कुत्ते को हटाने का निर्देश नहीं दिया है।उसका आदेश केवल यह सुनिश्चित करने के लिये है।लावारिस कुत्तों के साथ पशु जन्म नियंत्रण नियमो के अनुसार किया जाए।कोर्ट ने माना है कि बुनियादी ढांचे की समस्या है,यह वास्तविक समस्या है लेकिन नियमों का पालन न होना स्वीकार नहीं है।कुत्तों की संख्या बढ़ गई है तो उसे कम तो करनी पड़ेगी।स्कूलों, अस्पतालों व हाइवे पर कुत्ते है तो उनको हटाना तो पड़ेगा।
हमारे छत्तीसगढ़ में होशियार लोगों की कमी नहीं है।काम कोई भी हो सरकार का पैसा खर्च हो रहा है तो वह उसमें अपनी कमाई कैसे हो सकती है, कोई तरीका निकाल ही लेते है।कुत्तों की संख्या कम करना है तो बहुत से लोगों को लगता होगा कि इसमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश कहां है।सच है या नहीं पता नही लेकिन चर्चा है कि एक शहर में नसबंदी किए गए कुत्तों को बिरयानी खिलाने के नाम पर खुद मायापति बन रहे हैं।मायापति बनने लोग कोल घोटाला,शराब,सट्टा घोटाला,चावल घोटाला कर लेते हैं। तो कुत्तों को बिरयानी खिलाना तो भ्रष्टाचार में नवाचार है,पहले कम से कम कलेक्टर,आईएएस तो ईमानदार होते थे तो उनको भी भ्रष्ट लोगों ने भ्रष्ट कर दिया है।भ्रष्टाचार का सिंडीकेट ज्यादा से ज्यादा लोगों को भ्रष्ट कर रहा है तो इसका असर नीचे तक तो होना ही है।

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