आखिर पचास साल क्यों लग गए अतिक्रमण हटाने में

0
20260108184958_AKJ

सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }
: अवैध कब्जा तो अवैध कब्जा होता है। उसे हटाने में समय नहीं लगना चाहिए।यह आदर्श स्थिति है।सब जानते है कि सरकारी जमीन पर कब्जा करना अपराध है लेकिन सबसे ज्यादा कब्जा सरकारी जमीन पर ही किया जाता है क्योंकि सरकार भी किसी पार्टी की होती है, पार्टी में बहुत सारे लोग होते हैं।वह और उनके समर्थक समझते हैं कि सरकार हमारी है तो सरकारी जमीन भी तो हमारी हुई। हमारी जमीन तो इस पर कब्जा सरकार के लोग ही करेंगे, राजनीतिक दलों को वोट देने वाले ही करेंगे। सरकारी जमीन पर जो कब्जा करते हैं वह किसी न किसी राजनीतिक दल का वोट बैंक होते हैं। किसी न किसी राजनीतिक दल के विरोधी होते हैं। इसलिए सरकारें बदलती हैं तो बरसों पुराने अवैध कब्जे हटाने की शुरूआत भी होती है।
कई बार कोई बरसों तक किसी राज्य में सत्ता में बना रहता है तो वह अपने वोट बैंक को बनाए रखना है, वोट बैंक को बढ़ाता भी है,किसी भी सरकारी जमीन पर वह गरीब लोगों को झोपड़ी बनाने को कहता है,सरकार अपनी होती है तो उनको वहां से हटाया नहीं जाता है, क्योंकि वह सत्तारूढ़ दल का वोट बैंक होता है।उस नगर का नाम उस राजनीतिक दल के किसी नेता के नाम पर रख दिया जाता है यानी यह साफ हो जाता है कि यह जो सरकारी जमीन पर बस्ती बसी है यह किस राजनीतिक दल का वोट बैंक है। इसको दूसरा दल बरसों बाद किसी राज्य में सत्ता में आता हैं तो बरसों बाद उस राज्य में अवैध कब्ज हटाए जाते हैं।क्योंकि उसको मालूम होता है कि पिछले सत्तारूढ़ दल के वोट कहां कहां पर हैं,सरकारी जमीन पर एक कब्जा कर वोट बैंक बनाता है तो दूसरा सरकारी जमीन पर कब्जा के नाम पर वोट बैंक को हटाने का काम करता है।
झोपडियों में रहने वाले एक बार सरकारी जमीन पर कब्जा करते हैं तो उनको लगता है कि हर जगह सरकारी जमीन कब्जा करने योग्य है। ऐसे लोग सड़क किनारे ही की छोटी छोटी दुकान ठेले आदि में लगाते हैं। इससे हर राज्य की सड़क में हजारों ऐसी छोटी छोटी दुकाने दिख जाती हैं जो सरकारी जमीन पर कब्जा कर चलती रहती है। ऐसे लोग हर राज्य में सरकारी जमीन पर रहते भी है और सरकारी जमीन पर ठेला या दुकान लगाकर कुछ न कुछ काम भी करते हैं।सरकारी तंत्र में भ्रष्ट लोगों के लिए यह आय का जरिया होते हैं, इसलिए सरकारी तंत्र के लोगों को मालूम होने के बाद यह लोग सरकारी जमीन पर रहते हैं और सरकारी जमीन पर ही छोटा मोटा व्यवसाय करते हैं, उनको हटाने का प्रयास नहीं करते हैं। यानी जहां भी अवैध कब्जे सरकारी जमीन पर होते है तो उसमे राजनीतिक दलों के साथ सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों का सहयोग भी होता है।
हर शहर में सरकारी जमीन का उपयोग करने और उस पर अवैध कब्जा कराने व उस अवैध कब्जे को बरकरार रखने के लिए एक पूरा तंत्र होता है।यह तंत्र तब मजबूत होता है जब किसी राजनीतिक दल की सरकार किसी राज्य में दस से बीस साल तक रहती है। ऐसी सरकार को बनाने में अवैध कब्जाधारियों का बड़ा सहयोग होता है, इसलिए सरकार अवैध कब्जे हटाने को सोचती तक नहीं है।ऐसे राजनीतिक दल किसी राज्य में होते हैं तो तब ही उस राज्य में सरकारी जमीन पर पचास साल तक लोग कब्जा किए रहते हैं और उनको हटाने कोई सरकार सोचती तक नहीं है। खबर पढ़ने को मिलती हैकि पुरानी दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके मे सरकारी जमीन पर से अवैध कब्जे पचास साल हटाए गए हैं्।बहुत से लोगों को लगता है कि अवैध कब्जे हैं तो हटाने में पचास साल क्यों लग गए।
किसी राज्य में अवैध कब्जे हटाने मे पचास साल लग जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह कब्जे पहले नहीं हटाए जा सकते थे,बिलकुल हटाए जा सकते थे लेकिन सरकार ही जब अवैध कब्जों को बनाए रखना चाहती है तो राज्य से अवैध कब्जे से हटाए नहीं जा सकते। यही वजह है तुर्कमान गेट से अवैध कब्जे तब हटाए जा सके हैं जब अवैध कब्जों को हटाने की इच्छा रखने वाली सरकार सत्ता में आई है। बीस साल तक राज्य में आप की सत्ता रही, उसने अवैध कब्जों को बनाए रखा क्योंकि इसी में उसका राजनीतिक हित था। भाजपा सरकार कई दशक बाद सत्ता में आई है तो वह सरकारी जमीन पर किए गए अवैध कब्जे हटा रही है। जब पचास पचास साल तो कहीं अवैध कब्जे होते रहे तो स्वाभाविक है कि अवैध कब्जे करने वालों का संख्या बढ़ जाती है. अवैध कब्जे करने वालों की संख्या ज्यादा हो जाती है तो अवैध कब्जे हटाने का विरोध भी ज्यादा होता है। सरकार को भला बुरा कहा जाता है कि यह सरकार जनता पर अत्याचार कर रही है।जो सरकार गलत काम करे वह सही मानी जाती है और जो सरकार सही काम करे वह गलत समझी जाती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *