पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए देसी गायों का संरक्षण बेहद जरूरी: डीके हरि

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नई दिल्ली { गहरी खोज }: दिल्ली शब्दोत्सव 2026 के दूसरे दिन प्रख्यात वक्ता और लेखक डीके हरि ने भारतीय कृषि, देसी गाय और प्राकृतिक खेती को लेकर अपने विचार साझा किए। उन्होंने गाय के गोबर की उपयोगिता, उसकी प्राकृतिक शक्ति और आधुनिक रासायनिक खेती से उसके अंतर को सरल भाषा में समझाया।
डीके हरि ने कहा कि भाषा का उद्देश्य बात को समझाना है, न कि उसे जटिल बनाना। वे अपनी बात हिंदी और अंग्रेजी के मिश्रण में इसलिए रखते हैं ताकि अधिक से अधिक लोग इसे समझ सकें। इसके बाद उन्होंने सीधे खेती और प्रकृति से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने बताया कि देसी गाय के गोबर में एक विशेष प्राकृतिक सुगंध होती है। जब ये खेतों में पड़ता है तो जमीन के भीतर मौजूद सूक्ष्म जीवों (माइक्रो ऑर्गेनिज्म) को सक्रिय करती है। ये सूक्ष्म जीव आमतौर पर जमीन की सतह से एक से डेढ़ फुट नीचे रहते हैं। गोबर की यह प्राकृतिक सुगंध मिट्टी में जाकर इन जीवों को ऊपर लाती है और उन्हें सक्रिय करती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। डीके हरि ने रासायनिक खाद और कीटनाशकों की आलोचना करते हुए कहा कि जब खेतों में केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड डाले जाते हैं, तो वे इन सूक्ष्म जीवों को सक्रिय नहीं करते। रसायन भले ही फसलों को अस्थायी लाभ दें, लेकिन मिट्टी की प्राकृतिक शक्ति को कमजोर कर देते हैं। इसके विपरीत गाय का गोबर मिट्टी को जीवित रखता है और प्राकृतिक तरीके से उसकी सेहत सुधारता है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि यह गुण केवल देसी गाय के गोबर में ही होता है, न कि विदेशी नस्लों के गोबर में। उनके अनुसार, देसी गाय का गोबर ही मिट्टी और पर्यावरण के लिए सबसे अधिक लाभकारी है।
डीके हरि ने भविष्य को लेकर चेतावनी देते हुए कहा कि आने वाले पचास वर्षों में फैक्ट्रियों से गोबर जैसा प्राकृतिक तत्व मिलना असंभव होगा। उन्होंने कहा कि गोबर किसी उद्योग में बनाया नहीं जा सकता, यह केवल गाय से ही प्राप्त होता है और वह भी देसी गाय से। इसलिए यदि प्राकृतिक खेती और पर्यावरण संतुलन को बचाना है, तो देसी गायों का संरक्षण बेहद जरूरी है।

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