भारतीय भाषाओं में निहित है भारत की आत्मा : द्रौपदी मुर्मु

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वर्धा{ गहरी खोज }: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि भारतीय भाषाएं ही देश की आत्मा की सच्ची अभिव्यक्ति हैं। उन्होंने कहा कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में संस्कृति, संवेदनशीलता और चेतना की एक समान धारा प्रवाहित होती है, जो भारत की एकता को सशक्त बनाती है।
राष्ट्रपति मुर्मु गुरुवार को महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि देश के विभिन्न राज्यों, विशेषकर पूर्वोत्तर क्षेत्र से बड़ी संख्या में विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अंतरभाषाई संवाद की परंपरा हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
राष्ट्रपति ने विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने की सलाह दी। उन्होंने दो प्रमुख राष्ट्रीय उद्देश्यों पर विशेष ध्यान देने का आह्वान किया। पहला औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को समाप्त करना और दूसरा भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करना। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी भाषा का विरोध नहीं होना चाहिए बल्कि सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान और गर्व किया जाना चाहिए।
उन्होंने महात्मा गांधी के नाम पर विश्वविद्यालय के नामकरण को उचित बताते हुए कहा कि इससे जुड़े सभी लोगों को हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के संवर्धन के लिए समर्पित रहना चाहिए। उन्होंने विश्वास जताया कि विश्वविद्यालय से जुड़े लोग गांधीजी के आदर्शों का पालन करते हुए इसकी प्रतिष्ठा को निरंतर बढ़ाएंगे।
शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि महात्मा गांधी शिक्षा को स्वावलंबन का आधार मानते थे। उन्होंने ऐसी शिक्षा को ही सार्थक बताया जो लोगों की जीवन आवश्यकताओं से जुड़ी हो और राष्ट्रहित में योगदान दे। उन्होंने कहा कि जनभावनाओं को समझने और समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाने वाली शिक्षा ही वास्तविक शिक्षा है।
राष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि अपनी भाषा में ही सृजन, नवाचार और मौलिक चिंतन संभव है। उन्होंने विद्यार्थियों से नकल के बजाय मौलिकता को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण भारतीय भाषाओं के सुदृढ़ आधार पर ही संभव है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विश्वविद्यालय के छात्र न केवल अपने व्यक्तिगत विकास में बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएंगे।

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