फारस की खाड़ी से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही में नौसेना का अहम रोलः नौसेना प्रमुख

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नई दिल्ली{ गहरी खोज }: भारतीय नौसेना ने फारस की खाड़ी क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस क्षेत्र में नौसेना के युद्धपोतों की तैनाती ने भारतीय नाविकों और समुद्री व्यापार को सुरक्षा का भरोसा दिया है। यह जानकारी स्वयं नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने दी।
उन्होंने पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता और उसके कारण समुद्री यातायात पर पड़ने वाले प्रभावों को गंभीर चुनौती बताया है। उन्होंने कहा कि आज के समय में सुरक्षा आपस में जुड़ी हुई, यह एक निरंतर और कठोर वास्तविकता बन चुकी है। यहां किसी संघर्ष की भौगोलिक दूरी उसके प्रभाव से दूरी नहीं दर्शाती। इसके साथ ही भारतीय नौसेना की क्षमता का जिक्र करते हुए नौसेना प्रमुख ने बताया कि इस वर्ष 15 से अधिक स्वदेशी प्लेटफॉर्म को नौसेना में शामिल करने की योजना है।
गौरतलब है कि दिल्ली में भारतीय नौसेना के टॉप कमांडर की एक महत्वपूर्ण कांफ्रेंस चल रही है। नौसेना प्रमुख ने यहां कमांडर्स कांफ्रेंस में यह बात कही। यहां एडमिरल त्रिपाठी ने वैश्विक शक्ति संतुलन में तेजी से आए बदलावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बीते पांच वर्षों में दुनिया प्रतिस्पर्धा के दौर से निकलकर संघर्ष के दौर में प्रवेश कर चुकी है। उन्होंने यह भी बताया कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि इन युद्धों में आर्थिक दबाव, तकनीकी बढ़त और ‘नैरेटिव वारफेयर’ जैसी अवधारणाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
भारतीय नौसेना के कमांडर्स की यह कांफ्रेंस में 14 से शुरू हुई है। इस कमांडर्स कांफ्रेंस में नौसेना प्रमुख के अलावा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ भी शामिल हुए। यहां नौसेना के कमांडर्स मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में समुद्री सुरक्षा, ऑपरेशनल तैयारियों और राष्ट्रीय हितों के लिए रणनीतिक तय कर रहे हैं। इसमें नौसेना का शीर्ष नेतृत्व, ऑपरेशनल कमांडर और वरिष्ठ अधिकारी भाग ले रहे हैं। नौसेना प्रमुख ने समुद्री सुरक्षा पर बढ़ते दबावों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा समुद्री क्षेत्र अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण बना दिया गया है। इसके पीछे एक साथ कई संघर्ष, विरोधी देशों की बढ़ती क्षमताएं, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कमजोर होती भूमिका एक बड़ा कारण है।
इसके अलावा गैर-राज्य तत्वों के लिए हथियारों की आसान उपलब्धता ने भी समुद्री क्षेत्र को चुनौतीपूर्ण बनाया है। ऐसे परिदृश्य में भारतीय नौसेना को हर दिन एक प्रतिस्पर्धी और संवेदनशील माहौल में काम करना पड़ रहा है। नौसेना प्रमुख ने भारतीय नौसेना की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए बताया कि बीते वर्षों में नौसेना ने अपनी युद्धक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है। सतह, पनडुब्बी और वायु क्षेत्रों में लगातार आधुनिकीकरण किया गया है। नौसेना ने मजबूत रखरखाव प्रणाली और बुनियादी ढांचे का विकास किया है। इन उपलब्धियों ने नौसेना को एक ‘कॉम्बैट-रेडी यानी युद्ध के लिए तैयार, विश्वसनीय और फ्यूचर-रेडी’ फोर्स बनाया है।
उन्होंने बताया कि नौसेना ने अपने कुल बजट का शत-प्रतिशत उपयोग किया है। 90 से अधिक पूंजीगत अनुबंध पूरे किए गए हैं। नौसेना प्रमुख ने यह भी बताया कि ‘आईएनएसवी कौंडिन्य’ की पहली यात्रा, मैरीटाइम महाकुंभ, आईएफआर, मिलन और आयओएनएस जैसे बहुपक्षीय आयोजनों ने भारत की समुद्री साख को और मजबूत किया है। एडमिरल त्रिपाठी ने नौसेना में मानव संसाधन विकास, प्रशिक्षण, चिकित्सा सुविधाओं, कल्याण और खेलों में किए गए सुधारों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि इन पहलों ने नौसेना के भीतर विश्वास, एकजुटता और मनोबल को मजबूत किया है। कमांडर्स कांफ्रेंस के दौरान संयुक्त संचालन, क्षमता विकास, रखरखाव, बहु-क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रशिक्षण, विदेशी सहयोग, मानव संसाधन और स्वदेशीकरण जैसे प्रमुख मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने भी नौसेना कमांडरों को संबोधित करते हुए बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य और युद्ध के बदलते स्वरूप के अनुरूप तैयारी करने पर बल दिया। नौसेना प्रमुख ने अंत में प्राथमिकताओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि युद्धक क्षमता को सर्वोच्च स्तर पर बनाए रखना, बल संरचना का विकास, लॉजिस्टिक्स और रखरखाव, नई तकनीकों का समावेशन, मानव संसाधन सुदृढ़ीकरण, संगठनात्मक लचीलापन और संयुक्तता को आगे बढ़ाना ही भारतीय नौसेना की दिशा तय करेंगे।

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