नियोक्ता को अपनी जेब से भरना होगा जुर्माना, सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के हित में सुनाया अहम फैसला
नई दिल्ली{ गहरी खोज } : सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के हित में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत दुर्घटना मुआवजा देने में देरी होने पर लगाया गया जुर्माना नियोक्ता को अपनी जेब से ही भरना होगा, भले ही मुआवजा राशि बीमा के तहत कवर क्यों न हो। अदालत ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि यह कानून एक सामाजिक कल्याण कानून है, इसलिए इसकी व्याख्या कर्मचारियों के हित में उदार और उद्देश्यपूर्ण तरीके से की जानी चाहिए। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अरविंद कुमार और पीबी वराले की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई फैसलों में कर्मचारियों के पक्ष में इस कानून की उदार व्याख्या पर जोर दिया है।
उन्होंने कहा, मुआवजे से संबंधित धारा 4ए(3)(बी) के तहत जुर्माने के भुगतान का दायित्व नियोक्ता पर निर्धारित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की उस याचिका पर आया है, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि मुआवजे के भुगतान में देरी होने पर जुर्माना कंपनी को देना, न कि नियोक्ता को। अदालत ने हाई कोर्ट के इस आदेश को रद्द कर दिया है। अब दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि 1995 के संशोधन में जानबूझकर जुर्माने को मुआवजा और ब्याज से अलग किया गया था, ताकि बीमा कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े और नियोक्ता समय पर भुगतान करने के लिए बाध्य रहें।
फैसला सुनाते हुए बेंच ने कहा कि कानून के उद्देश्यों के विवरण को पढऩे से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कानून संसद द्वारा लाया गया एक सामाजिक कल्याण कानून है, जिसका उद्देश्य रोजगार के दौरान या रोजगार के समय होने वाली दुर्घटनाओं में कर्मचारियों की शिकायतों का निवारण करना है। इसके तहत पर्याप्त मुआवजा शीघ्रता से दिया जाता है ताकि कर्मचारी या उसका परिवार चोट लगने की स्थिति में कर्मचारी के चिकित्सा खर्चों का वहन कर सके या कर्मचारी की मृत्यु होने पर आजीविका चला सके।
