छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने का संकल्प

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राजभाषा आयोग का नौवां प्रांतीय सम्मेलन संपन्न
बिलासपुर{ गहरी खोज } : छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शीघ्र स्थान दिलाने के दृढ़ संकल्प के साथ छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का दो दिवसीय नौवां प्रांतीय सम्मेलन संपन्न हुआ। बिलासपुर में आयोजित इस सम्मेलन में भाषा, साहित्य और प्रशासन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गहन मंथन हुआ और छत्तीसगढ़ी को जनभाषा से आगे बढ़ाकर संवैधानिक पहचान दिलाने की आवश्यकता पर एक स्वर में जोर दिया गया।
सम्मेलन के सातवें सत्र में “छत्तीसगढ़ी भाषा का स्थानीय बोलियों के साथ अंतर्संबंध” विषय पर विचार रखे गए। वक्ताओं ने कहा कि सरगुजिया, हल्बी, कुडुख जैसी स्थानीय बोलियां छत्तीसगढ़ी की आत्मा हैं और इन्हीं से इसकी भाषाई शक्ति और विविधता बनती है। डॉ. सुधीर पाठक, रुद्र नारायण पाणिग्रही और डॉ. ईशाबेला लकरा ने शोध आधारित प्रस्तुतियों के माध्यम से इन भाषाओं के छत्तीसगढ़ी से गहरे रिश्तों को रेखांकित किया। सत्र की अध्यक्षता डॉ. राघवेंद्र कुमार दुबे ने की।
आठवें सत्र में “प्रशासनिक कार्य-व्यवहार में छत्तीसगढ़ी” पर केंद्रित संगोष्ठी हुई। न्यायमूर्ति चन्द्रभूषण वाजपेयी की अध्यक्षता में आयोजित इस सत्र में वक्ताओं ने कहा कि शासन को जनता के करीब लाने के लिए प्रशासनिक कामकाज में छत्तीसगढ़ी का प्रयोग समय की मांग है। विशेषज्ञों ने इसे लोकतंत्र को अधिक संवेदनशील और प्रभावी बनाने का माध्यम बताया।
नौवें सत्र में “छंद विधा में छत्तीसगढ़ी” विषय पर चर्चा हुई, जिसमें छत्तीसगढ़ी काव्य परंपरा की समृद्धि और छंदबद्ध साहित्य की वर्तमान प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने कहा कि छंद विधा के संरक्षण और नवाचार से छत्तीसगढ़ी साहित्य को राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान मिल सकती है।
सम्मेलन का समापन ‘खुला मंच’ सत्र के साथ हुआ, जहां प्रदेश भर से आए साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों ने छत्तीसगढ़ी के विकास के लिए अपने सुझाव रखे। इस अवसर पर सभी जिला समन्वयकों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का सांस्कृतिक आकर्षण छत्तीसगढ़ी हायर सेकेंडरी स्कूल, पाली की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत लोकनृत्य रहा, जिसने पूरे सभागार को उत्साह से भर दिया।
सम्मेलन का आयोजन संस्कृति एवं राजभाषा विभाग के मार्गदर्शन में, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की सचिव डॉ. अभिलाषा बेहार के निर्देशन में तथा बिलासपुर इकाई के सहयोग से किया गया। आयोजकों ने दोहराया कि छत्तीसगढ़ी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने का यह अभियान निरंतर जारी रहेगा।

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