मद्रास हाईकोर्ट की सलाह
इरविन खन्ना
संपादकीय { गहरी खोज }: मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने केंद्र सरकार को बच्चों द्वारा इंटरनेट के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने पर विचार करने की सलाह दी है। अदालत ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया की तरह भारत में भी ऐसा कानून लाया जा सकता है, जिसका उद्देश्य 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया अकाउंट रखने से रोकना हो। अदालत का मानना है कि इससे नाबालिगों को हानिकारक और अनुचित ऑनलाइन सामग्री से बचाया जा सकेगा। जस्टिस जी. जयचंद्रन और जस्टिस के. के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान की। याचिका एस. विजयकुमार द्वारा दायर की गई थी, जिसमें इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को ‘पैरेंटल विंडो’ सुविधा उपलब्ध कराने और बच्चों में सुरक्षित इंटरनेट उपयोग को लेकर जागरूकता फैलाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता के वकील के.पी.एस. पलानीवेल राजन ने दलील दी कि इंटरनेट पर अश्लील और हानिकारक सामग्री आसानी से उपलब्ध है, जिससे बच्चे प्रभावित हो सकते हैं। अदालत ने कहा कि जब तक कोई विशेष कानून लागू नहीं होता, तब तक राज्य और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग बच्चों के अधिकारों और सुरक्षित इंटरनेट उपयोग को लेकर एक ठोस कार्य योजना तैयार कर सकते हैं। 2024 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 14-16 साल के 82 प्रतिशत बच्चे स्मार्टफोन यूजर हैं। इन्हीं में से 76 प्रतिशत सर्वे के पिछले सप्ताह तक सोशल मीडिया चला रहे थे। 16 साल से कम उम्र के करीब 35 करोड़ बच्चे हैं। लोकल सर्कल्स सर्वे बताता है कि बच्चे रोजाना तीन घंटे से अधिक समय ऑनलाइन बिता रहे हैं। 9 से 17 साल के बच्चों के करीब 66 प्रतिशत अभिभावक मानते हैं कि सोशल मीडिया, ओटीटी और गेमिंग ने बच्चों में अधीरता, गुस्सा और सुस्ती जैसे लक्षणों को बढ़ा दिया है। मदुरै कोर्ट का मानना है कि आज के दौर में इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कोई ‘गेटकीपिंग’ नहीं है। एक नाबालिग बच्चा आसानी से ड्रग्स, तंबाकू या अश्लील सामग्री तक पहुंच सकता है। हाल के कुछ स्कूलों के उदाहरणों को देखें तो बच्चों में सुसाइड की भावना बढ़ गई है। गौरतलब है कि ऑस्ट्रेलिया ने इसी 10 दिसंबर को ऑनलाइन सुरक्षा संशोधन (सोशल मीडिया न्यूनतम आयु) अधिनियम 2024 लागू किया। इसमें 16 साल से कम उम्र वालों के लिए सोशल मीडिया बैन किया। मकसद बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाना, उन्हें सामाजिक, भावनात्मक समय देना। यदि किसी बच्चे ने कानून तोड़ा तो सजा उसे या माता-पिता को नहीं, बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों को मिलेगी। कंपनियों को सुनिश्चित करना होगा कि वे ‘एज वेरिफिकेशन’ तकनीक का इस्तेमाल करें। अगर वे इसमें फेल होती हैं, तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा। मोबाइल बच्चों के दिमाग की ‘वायरिंग’ से छेड़छाड़ कर रहा है। वेस्टिब्यूलर डिस्फंक्शन यानी मोबाइल की स्थिर स्क्रीन के कारण बच्चों का शारीरिक संतुलन बिगड़ने लगता है। इसके साथ ही प्रोप्रियोसेप्टर की भी समस्या हो रही है। इसमें जोड़ों और शरीर की पोजिशन का सही एहसास नहीं हो पाता। तीसरी दिक्कत टैक्सटाइल सेंसरी की है यानी छूने और महसूस करने की संवेदनाएं या तो बहुत बढ़ जाती हैं या बिल्कुल कम हो जाती हैं। खास बात है कि साधारण ऑटिज्म जन्म से होता है, जबकि वर्चुअल ऑटिज्म सेल फोन की स्क्रीन पैदा करती है। इसका सीमित प्रयोग लाभप्रद है। डिजिटल डिटॉक्स और रियल इंटरेक्शन समस्या का हल है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि जिन बच्चों के हाथ भारत का कल है, वह मोबाइल की लत के कारण मानसिक रूप से कमजोर या यह भी कह सकते हैं कि व्यवहारिक दृष्टि से भी कमजोर हो रहे हैं। यह अति चिंता का विषय है, जिस पर मद्रास हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार का ध्यान खीचा है। सरकार के साथ-साथ समाज को भी बच्चों की मोबाइल की बढ़ती लत के प्रति सतर्क होने की आवश्यकता है।
