झीरम कांड मतलब एक दूसरे पर आरोप लगाओ
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: राजनीतिक दलों के लिए कई मुद्दे महज एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने के लिए होते हैं। वह जब भी मौका मिलता है तो उस मुददे को उठाकर एक दूसरे पर आरोप लगाते है, एक दूसरे को दोषी ठहराते हैं। फिर लंबे समय तक उस मुद्दे की ओर दोनों राजनीतिक दल ध्यान नहीं देते हैं।छत्तीसगढ़ में झीरम कांड ऐसा ही मुद्दा है। यह लंबे समय से भाजपा व कांग्रेस के बीच फुटबाल बना हुआ है। कभी मौका मिलने पर भाजपा को कोई राज्य या केंद्र का नेता झीरम मुद्दे को किक मारकर कांग्रेस की तरफ भेज देता है और इसके लिए कांग्रेस को दोषी ठहराने का प्रयास करता है तो जवाब में राज्य के कांग्रेस नेता किक मारकर फिर भाजपा की तरफ भेज देते हैं और झीरम कांड के लिए भाजपा को दोषी ठहराने का प्रयास करते हैं। यह सिलसिला चलता रहता है।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा यहां आयोजित जनादेश परब में शामिल होने आए थे तो इस दौरान उन्होंने झीरम कांड को लेकर कहा कि कांग्रेस के भीतर ही ऐसे लोग मौजूद थे,जो नक्सलियों के संपर्क में थे। ऐसे लोगों ने ही माओवादियों से अपने लोगों को मरवाने का काम काम किया।जेपी नड्डा के इस आरोप से झीरम कांड को लेकर आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।यह आरोप पत्यारोप कोई नई बात नहीं है।यह तो सच है कि झीरम कांड हुआ है, नक्सलियों ने कांग्रेस के बड़े नेताओं की हत्या की है। सीधी सी बात है कि इसके लिए सीधे तौर पर नक्सली दोषी हैं। भाजपा का कांग्रेस के बीच यह गंभीर मुद्दा सच को सामने लाने की जगह आरोप प्रत्यारोप लगाने का मुद्दा रहा है। यानी कांग्रेस इस घटना के लिए भाजपा सरकार तो दोषी ठहराने का प्रयास करती है तो भाजपा नेता इसके लिए कांग्रेस के कुछ नेताओं को दोषी ठहराने का प्रयास करती है।
झीरम कांड को हुए कई बरस हो गए हैं लेकिन इसका सच अब तक सामने नही आ सका है तो इसके लिए भाजपा व कांग्रेस दोनों राजनीतिक दल कमोबेश दोषी माने जाते हैं। भाजपा कई साल सत्ता में रही लेकिन उसके सत्ता में रहने के दौरान झीरम कांड का सच सामने नहीं आ सका। तब कांग्रेस नेता भूपेश बघेल भाजपा सरकार पर आरोप लगाया करते थे कि वह झीरम कांड की जांच को लेकर गंभीर नहीं है।कांग्रेस की सरकार बनी और वह पांच साल रही लेकिन इस दौरान कांग्रेस सरकार भी झीरम का सच सामने लाने मे असफल रही। भूपेश बघेेल तो एक समय यह कहते थे उनके पास सबूत है लेकिन पांच साल बीत गए वह कोई सबूत सामने नहीं लाए। झीरम कांड जाहिर तौर पर नक्सलियों ने किया है। इसके कई कारण बताए जाते हैं, एक कारण तो सलवा जुडूम भी बताया जाता है, इसके अलावा झीरम कांड के बाद इस बात की भी चर्चा रही कि कांग्रेस के कुछ लोगों ने ही अपने नेताओं को नक्सलियों के जरिए मरवाया है।
झीरम कांड होने के बाद इस बात की खूब चर्चा रही कि तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल का प्रभाव बढ़ रहा था, इससे कांग्रेस के कुछ बड़े नेता खुश नहीं थे।उन्ही नाखुश नेताओं ने नंद कुमार पटेल सहित कई नेताओं को नक्सलियों का उपयोग कर मरवा दिया और सुरक्षा की कमी का आरोप लगा इसके लिए पूरी तरह भाजपा सरकार को दोषी बताने का प्रयास किया गया। नंद कुमार पटेल सहित कई वरिष्ट नेताओं के मारे जाने से कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिए कई लोगों को मौका मिला। वह राज्य की राजनीति में अपना महत्व बढ़ाने में सफल रहे।झीरम कांड का सच सामने आता कई लोगों को परेशानी होती, इसलिए भाजपा को हाे या कांग्रेस नेताओं ने इस कांड पर रहस्य का पर्दा पड़े रहने दिया। कहने को एनआईए की जांच भी हुई लेकिन इस पर खूब विवाद भी हुआ, आराेप प्रत्यारोप भी हुए लेकिन झीरम कांड का सच आज तक सामने नहीं आया है।
साय सरकार के समय बड़े बड़े नक्सली नेताओं के सरेंडर करने से बस्तर से नक्सलियों का सफाया हो रहा है। इस दौरान कई बड़े नक्सली नेता मारे जा चुके हैं, उनमें कई झीरम कांड में शामिल रहे हैं। कई ऐसे नेताओं ने सरेंडर भी किया है जो हो सकता है कि झीरम कांड का सच जानते हों। जो यह बता सकते हैं कि झीरम कांड में कौन कौन शामिल थे, यह कांड नक्सलियों ने खुद बदला लेने के लिए किया था या किसी नेता ने माओवादियों को उपयोग कांग्रेस नेताओं को मरवाने के लिए किया था।झीरम कांड में शामिल लोग तो यह बताने से रहे कि वह इसमें शामिल थे,क्योंकि वह कुछ भी कहेंगे तो वह अपराध स्वीकारने की तरह होगा। इसलिए इस बात की कोई उम्मीद नहीं है कि झीरम कांड के आरोपियों के नाम कभी सामने आएंगे। यानी झीरम कांड का सच शायद की कभी सामने आए क्योंकि सरकारों ने गंभीरता से प्रयास नहीं किया और सरेंडर करने वाले नक्सली किसी को बताने से रहे कि झीरम कांड का सच क्या है।
