नीतीश का रिकॉर्ड 10वां कार्यकाल, कल्याणकारी योजनाएं और बुनियादी ढांचा विकास ने बिहार के घटनापूर्ण 2025 को परिभाषित किया
पटना{ गहरी खोज }: बिहार का राजनीतिक परिदृश्य 2025 में सत्ता के लिए हुए तीखे मुकाबले से प्रभावित रहा, जिसका अंत नवंबर में हुए विधानसभा चुनावों में एनडीए की निर्णायक जीत के साथ हुआ। करीब दो दशकों से सत्ता में रहने के बावजूद संभावित सत्ता-विरोधी लहर की अटकलों को नकारते हुए आए इस जनादेश ने एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया। नीतीश कुमार ने रिकॉर्ड 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिससे वे राज्य के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्री बन गए।
75 वर्षीय कुमार के नेतृत्व में जद(यू) ने 2020 के चुनावों की तुलना में लगभग दोगुनी सीटें हासिल कीं, जबकि सहयोगी भाजपा गठबंधन में वरिष्ठ भागीदार बनी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में हुआ उनका शपथ ग्रहण समारोह, वर्षों के राजनीतिक पुनर्संयोजन के बाद एनडीए में स्थिरता पर नए सिरे से जोर का प्रतीक माना गया। नई विधानसभा में कुमार ने केंद्र के साथ घनिष्ठ समन्वय पर बल देते हुए सरकार द्वारा कही जा रही ‘डबल इंजन’ मॉडल को बिहार के विकास का आधार बताया। यह नैरेटिव एनडीए के चुनाव अभियान का प्रमुख स्तंभ बन गया।
विपक्ष, विशेषकर राजद के तेजस्वी यादव के नेतृत्व में, रोजगार, भत्तों और सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित मजबूत जनवादी एजेंडे के साथ मुकाबले में उतरा। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में यादव को पसंदीदा मुख्यमंत्री उम्मीदवार बताया गया और उन्होंने चुनाव से पहले सरकार पर विपक्षी कल्याणकारी योजनाओं की नकल करने का आरोप लगाया। हालांकि, सत्तारूढ़ गठबंधन ने कहा कि वह केवल योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी ला रहा है।
कल्याणकारी योजनाएं पूरे साल राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहीं। सरकार ने पेंशन योजनाओं का विस्तार किया, 125 यूनिट तक मुफ्त बिजली की घोषणा की, बिहार की मूल निवासी महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण लागू किया और ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ शुरू की, जिसके तहत 1.5 करोड़ से अधिक महिलाओं को 10,000 रुपये की सहायता दी गई। कुछ घोषणाओं के समय को लेकर आलोचना हुई, लेकिन इन योजनाओं ने एनडीए की लोकप्रियता को काफी बढ़ाया।
चुनावी माहौल निर्वाचन आयोग द्वारा की गई मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया से भी प्रभावित रहा, जिसमें करीब 65 लाख नाम हटाए गए। आयोग ने कहा कि ये नाम दोहराव या अयोग्य मतदाताओं के थे, लेकिन कांग्रेस के राहुल गांधी के नेतृत्व वाले ‘इंडिया’ गठबंधन ने इसे ‘वोट चोरी’ करार दिया। गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’, जो यादव और वाम दलों के सहयोग से निकाली गई, भीड़ तो जुटा सकी, लेकिन चुनावी नतीजों में इसका असर नहीं दिखा और महागठबंधन 243 सदस्यीय विधानसभा में 40 से कम सीटों पर सिमट गया।
बाद में सामने आए आंकड़ों से पता चला कि विपक्ष का वोट शेयर 2020 की तुलना में लगभग स्थिर रहा, जबकि एनडीए के वोट शेयर में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जिसका मुख्य कारण कल्याणकारी योजनाएं मानी गईं। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी सहित नए राजनीतिक दल कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ सके।
चुनावों से इतर, शासन से जुड़ी चुनौतियां भी साल भर सामने रहीं। नए पुलों, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और पटना मेट्रो के आंशिक संचालन के जरिए बुनियादी ढांचे के विकास को प्रमुखता से दिखाया गया। हालांकि, विभिन्न जिलों में पुलों के ढहने की घटनाओं ने निर्माण गुणवत्ता और निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए, जिसके बाद समीक्षा, प्रशासनिक कार्रवाई और तृतीय-पक्ष निरीक्षण सहित अधिक सख्त रखरखाव ढांचा लागू किया गया।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी प्रगति हुई, जहां नए सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल शुरू किए गए। खेलो इंडिया कार्यक्रम के तहत खेल सुविधाओं का विस्तार हुआ और बिहार दिवस जैसे सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए विरासत और विकास के मिश्रण को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
कुल मिलाकर, 2025 बिहार के लिए एक निर्णायक वर्ष साबित हुआ — जिसमें नीतीश कुमार के नेतृत्व में राजनीतिक एकीकरण, आक्रामक कल्याणकारी रणनीति और बुनियादी ढांचे पर नए सिरे से, हालांकि कड़ी निगरानी के साथ, जोर देखने को मिला।
