सेकुलरवाद का बहाना, वोटरों पर निशाना

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उमेश चतुर्वेदी
लेख-आलेख { गहरी खोज }:
बिहार में जाति-धर्म की सियासी पिच पर बुरी तरह मात खाने के बावजूद इंडिया गठबंधन का भरोसा इसी पर है। तमिलनाडु में जिस तरह कार्तिगई दीपम परंपरा स्थापित करने का आदेश देने वाले मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश जी आर स्वामीनाथन के खिलाफ गठबंधन ने लामबंदी की है, उससे यही संकेत मिल रहे हैं। डीएमके सांसद कनिमोई की अगुआई में विपक्षी गठबंधन के 120 सांसदों द्वारा स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग का नोटिस देना गठबंधन की पारंपरिक राजनीति का ही विस्तार है। विपक्षी गठबंधन यह पचा नहीं पा रहा है कि कथित सेकुलर देश में किसी जज ने बहुसंख्यक सनातनी परंपरा स्थापित करने का निर्णय दे दिया है। स्वामीनाथन के फैसले के अनुसार, जहां कार्तिदीपम मनाया जाना है, वहां एक दरगाह भी है। दरगाह और मंदिर साथ हो तो मंदिर की कीमत पर दरगाह की परंपराएं अपने यहां चलती रही हैं। अब तक की शासन व्यवस्था के लिहाज से ऐसे मामलों में मंदिर के पक्ष में फैसला सवालों के घेरे में आता है।
स्वामीनाथन ने मदुरै जिले की थिरूपरनकुंद्रम की पहाड़ी की चोटी पर कार्तिगई दीपम की परंपरा को स्थापित करने की मंजूरी दी है, जिसे 1920 के एक विवाद के बंद कर दिया गया था। यह बात और है कि डीएमके की अगुआई वाली तमिलनाडु सरकार ने विवाद की आशंका के बहाने अदालत के फैसले को लागू ही नहीं होने दिया। दिलचस्प है कि अल्पसंख्यक समुदाय ने इसका विरोध भी नहीं किया, बल्कि सरकार ही खुद आगे बढ़कर विवाद की आशंका से भर उठी। राज्य सरकार ने स्वामीनाथन के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी है। लेकिन इस फैसले के लिए स्वामीनाथन को पचा नहीं पा रही है। उसे लगता है कि अगर उसने जज को सबक नहीं सिखाया तो उसकी सेकुलरवाद के बुनियाद पर टिकी राजनीति में दरार पड़ सकती है। जज को सबक सिखाने और न्यायपालिका पर अंकुश लगाने के डीएमके के इस कदम में सबसे हैरतनाक कदम है, अखिलेश यादव का बढ़ृ-चढ़कर हिस्सा लेना। लोकसभा अध्यक्ष को महाभियोग प्रस्ताव पेश करते वक्त कनिमोई के साथ कांग्रेसी नेताओं और अखिलेश की मौजूदगी के संकेत गहरे हैं। दरअसल महागठबंधन के दल अल्पसंख्यक समुदाय को यह संकेत देने की कोशिश में हैं कि सिर्फ और सिर्फ इंडिया गठबंधन ही उसके हितों के लिए किसी जज को भी सूली पर चढ़ा सकता है। महागठबंधन की कोशिश कुछ महीने बाद होने वाले तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के लिए राज्य की करीब छह फीसद अल्पसंख्यक आबादी को लुभाना भी है। वैसे देखा जाए तो राज्य की सात करोड़ 21 लाख की आबादी में अल्पसंख्यकों की जनसंख्या महज 42 लाख तीस हजार ही है। ब्राह्मणवाद की बुनियाद पर उभरी डीएमके की राजनीति में अल्पसंख्यकवाद पिछड़ी जातियों को लुभाने का भी मंत्र रहा है। राज्य की अधिसंख्य पिछड़ी आबादी को भी लुभाने की इस बहाने की कोशिश हो रही है। इसीलिए कार्तिगई दीपम की परंपरा को रोकने में डीएमके को कोई हिचक नहीं हुई।
इस पूरे मसले पर चर्चा से पहले जानना जरूरी है कि कार्तिगई दीपम त्योहार है क्या? दक्षिम के दीप पर्व के रूप में विख्यात कार्तिगई दीपम भगवान मुरूगन के सम्मान में तमिल महीने में दीप जलाने की परंपरा है। शिव और पार्वती के बड़े पुत्र कार्तिकेय तमिलनाडु में मुरूगन और सुब्रह्मण्यम के नाम से भी जाने जाते हैं। मदुरै जिले की जिस थिरुपरनकुंद्रम की पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम मनाने का आदेश अदालत ने दिया, वह भगवान मुरूगन की छह पवित्र जगहों में से एक है। मान्यता है कि ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद को सुलझाने के लिए शिवजी स्वयं अनंत अग्निस्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। उसी दीप स्तंभ की स्मृति स्वरूप उचिपिल्लायर मंदिर के पास प्राचीन दीपाथुन नामक स्तंभ के नजदीक महादीपक जलाया जाता है। थिरूपरनकुंद्रम की पहाड़ी पर भी इसकी परंपरा रही। लेकिन बाद में वहां मंदिर के नजदीक ही एक दरगाह स्थापित हो गई। दरगाह के बाद सेकुलरवाद को बढ़ावा देना जरूरी था, लिहाजा दीपम की परंपरा अधिकारियों ने रोक दी। जिसे शुरू करने को लेकर अदालती हस्तक्षेप की मांग की गई। पहले मदुरै की जिला अदालत में मामला चला और बाद में मद्रास हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। जिसकी सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन ने पहाड़ी पर दीप जलाने की परंपरा शुरू करने का आदेश दिया। इसके बाद पहाड़ी पर तीन दिसंबर को दीप जलाने श्रद्धालुओं का जमावड़ा होने लगा। लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया। राज्य की स्टालिन सरकार का कहना था कि इससे खून-खराबा हो सकता है। जबकि अल्पसंख्यकों की ओर से ऐसी कोई कोशिश या बयानबाजी भी नहीं हुई थी। बहरहाल, डीएमके सरकार के इस फैसले ने राज्य में पैर जमाने की कोशिश में बैठी बीजेपी को मुद्दा दे दिया। पार्टी का कहना है कि डीएमके सेक्युलरिज्म की बात करती तो है, लेकिन उसके निशाने पर सिर्फ़ हिंदू समुदाय ही रहता है। बीजेपी का आरोप है कि डीएमके ने कभी किसी गैर हिंदू परंपरा, दरगाह या आदि पर कभी कोई सवाल नहीं खड़ा किया। बीजेपी पूछ रही है कि आखिर राज्य के हिंदुओं ने कौन सी गलती की है कि उन्हें दीप जलाने के अधिकार के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।
डीएमके की पूर्ववर्ती जस्टिस पार्टी की स्थापना 1916 में हुई थी। उसका घोषित उद्देश्य एनी बेसेंट की अगुआई वाले होम रूल लीग आंदोलन का विरोध था। जस्टिस पार्टी का मानना था कि अगर होमरूल आंदोलन सफल हुआ तो तमिलनाडु में जारी ब्राह्मणवाद की वजह से ब्राह्मण अधिकारियों की तादाद बढ़ जाएगी। एक तरह से कह सकते हैं कि जस्टिस पार्टी की स्थापना ब्राह्मणवाद के विरोध के लिए हुई थी। कालांतर में उसकी ब्राह्मणवाद विरोध की राजनीति बढ़ते-बढ़ते ब्राह्मण विरोध पर केंद्रित हो गई। बाद में उसके विरोध के दायरे में हिंदी और पूरी सनातन परंपरा समा गई। यही वजह है कि स्टालिन कुनबे को हिंदुत्व की कटु आलोचना से कभी परहेज नहीं रहता। अहर्निश हिंदी विरोध और अब कार्तिगई दीपम का विरोध इसी परंपरा का विस्तार है।
विपक्षी गठबंधन को इन दिनों संविधान बचाने की बहुत चिंता है। ‘संविधान खतरे में है’ की आवाज बुलंद करने वाले विपक्षी गठबंधन के दलों की नजर में न्याय वही है, जो उनके नैरेटिव के हिसाब से हो, अन्यथा वह सेकुलरवाद का विरोध है। राममंदिर पर सर्वोच्च न्यायाल के फैसले को ये दल अब भी दिल से स्वीकार नहीं कर पाए हैं। इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनावी कदाचार के आरोप में रायबरेली का निर्वाचन खारिज कर दिया था, तब न्यायपालिका की शक्तियां ही क्षीण कर दी गईं। मोहन कुमार मंगलम तो इससे भी दो कदम आगे बढ़ते हुए प्रतिबद्ध न्यायपालिका की बात करने लगे थे।
पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति शेखर यादव के एक बयान को लेकर भी विपक्षी गठबंधन नाराज हो गया था। शेखर ने कहा था, “ये कहने में बिल्कुल गुरेज़ नहीं है कि ये हिन्दुस्तान है। यहां रहने वाले बहुसंख्यकों के अनुसार ही देश चलेगा। यही क़ानून है। आप यह भी नहीं कह सकते कि हाई कोर्ट के जज होकर ऐसा बोल रहे हैं। क़ानून तो बहुसंख्यक से ही चलता है।”
इसी अंदाज में स्वामीनाथन पर भी निशाना साधा जा रहा है। इसने एक बार फिर डीएमके और इंडिया गठबंधन की सियासी रणनीति का चेहरा उजागर किया है। डीएमके ने सेक्युलरिज्म आधारित जो प्रशासनिक मॉडल बनाया है, उसके निशाने पर सिर्फ हिंदू हैं। भगवान मुरुगन की सदियों पुरानी परंपरा को रोकना उसी मॉडल की परिणति है। डीएमके की नीति अल्पसंख्यक समुदायों को खुश करना और हिंदू समुदाय के खिलाफ़ आक्रामक रहा है। राज्य में वक्फ की ज़मीनों को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है। चर्च का धन भी अछूता है। लेकिन हिंदू मंदिरों के कोष पर राज्य का नियंत्रण है। मंदिरों की जमीनें भी सरकारी नियंत्रण में है। लेकिन अब राज्य का जनमत बदल रहा है। बीजेपी की कोशिश तमिल हिंदुत्व को उभारकर अपनी बुनियाद को मजबूत करना है। वह डीएमके के इस दोहरे चरित्र को लोगों को समझाने की कोशिश में है। ऐसे में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव इस बार गैर पारंपरिक रंग में नजर आ सकता है।

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