केजरीवाल की चिट्ठी को बताया ‘कोर्ट की अवमानना’, राजनीतिक सिद्धांतों पर उठाए सवाल :जस्टिस लोकपाल

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नई दिल्ली{ गहरी खोज }: उत्तराखंड हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस लोकपाल सिंह ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के नाम अरविंद केजरीवाल की चिट्टी को ‘कोर्ट की अवमानना’ करार दिया है। उन्होंने कहा कि जिस सिद्धांत के साथ केजरीवाल राजनीति में आए, उसके बारे में सभी जानते हैं, लेकिन उन्होंने खुद ही उन सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाईं।
जस्टिस लोकपाल सिंह ने बात करते हुए कहा, “अरविंद केजरीवाल की ओर से लिखे गए इस पत्र को ‘कोर्ट की अवमानना’ के मामले के तौर पर देखा जाना चाहिए। जब ​​उनके खिलाफ एक फैसला आ चुका था, जिसमें जस्टिस शर्मा ने खुद को इस मामले से अलग करने से इनकार कर दिया था, तो उनके पास उस आदेश को चुनौती देने का अधिकार था। लेकिन, कार्यप्रणाली के नियमों में कहीं भी किसी जज को इस तरह का पत्र लिखने का कोई प्रावधान नहीं है।”
उन्होंने कहा, “अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं कि वे खुद पेश नहीं होंगे और न ही अपनी ओर से कोर्ट में पेश होने के लिए किसी वकील का इंतजाम करेंगे। अदालत का जो भी फैसला होगा, उसको वह सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।” इसी बीच, केजरीवाल के सिद्धांतों पर सवाल उठाते हुए जस्टिस लोकपाल सिंह ने कहा, “सभी जानते हैं कि अरविंद केजरीवाल का अपना क्या दृष्टिकोण रहा है। वह किस सिद्धांत के आधार पर राजनीति में आए थे और अभी उन सिद्धांतों की उन्होंने स्वयं किस तरह धज्जियां उड़ाईं, जिसमें चाहे वह शीशमहल का प्रकरण हो या उनके खिलाफ लगे अनेक आरोप हों। वे खुद आबकारी नीति से जुड़े मामले में काफी दिन जेल में रहे।”
लोकपाल सिंह ने कहा, “यह कहना है कि मैं न्यायालय पर विश्वास करता हूं, लेकिन इस जज के ऊपर विश्वास नहीं करता हूं। मेरा केस किसी अन्य जज के सामने सुना जाए, तो ऐसे बयानों से कोई लाभ नहीं होता है। यह सिर्फ हिट एंड रन वाली स्थिति होती है। उन्होंने पहले भी कुछ मामलों में ऐसा किया है। पहले आरोप लगाए और फिर उन्होंने माफी मांग ली थी।”
केजरीवाल के आरोपों को लेकर लोकपाल सिंह ने कहा, “हमारी अदालत प्रणाली में एक क्रम होता है। इसमें निचली अदालतें होती हैं, फिर हाईकोर्ट और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट। अगर कोई केजरीवाल जैसे आरोप लगाने लगे, तो यह प्रणाली ठीक से काम नहीं कर सकती। किसी जज पर आरोप लगाना बहुत आसान है, लेकिन जज योग्यता के आधार पर काम करते हैं और अपने फैसले भी योग्यता के आधार पर ही देते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “जब किसी को किसी जज से अपने पक्ष में कोई आदेश मिलता है, तो वे उस जज को अच्छा मानते हैं। लेकिन जहां, सुनवाई पूरी होने से पहले ही यह मान लिया गया है कि जज उनके खिलाफ फैसला देंगे।”
जस्टिस लोकपाल सिंह ने यह भी कहा कि केजरीवाल को इंतजार करना चाहिए कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा क्या आदेश देती हैं। उन्हें कार्यवाही में हिस्सा लेना चाहिए, अपना पक्ष रखना चाहिए और हाईकोर्ट के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे किन आधारों पर खुद को आरोप-मुक्त किए जाने की मांग कर रहे हैं। बिना दलीलें पेश किए, यह प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ सकती है।

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