कोयले की कीमतों में बढ़ोतरी से उपभोक्ताओं को बचाने के लिए कोल इंडिया खुद उठा रही है लागत का बोझ

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नयी दिल्ली{ गहरी खोज }: सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) उपभोक्ताओं को कोयले की ऊंची कीमतों से बचाने के लिए बढ़ती कच्चे माल की लागत खुद वहन कर रही है। विस्फोटक और औद्योगिक डीजल जैसे प्रमुख कच्चे माल के खर्च में पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद तेज बढ़ोतरी हुई है। कंपनी ने कहा कि इस अतिरिक्त लागत को उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जा रहा है, क्योंकि ऐसा करने से कोयले पर निर्भर विभिन्न क्षेत्रों पर व्यापक असर पड़ सकता है।
कंपनी अपनी खदानों में काम कर रहे ठेकेदारों को बढ़ी हुई डीजल कीमतों का मुआवजा भी दे रही है। खुले खनन में इस्तेमाल होने वाले विस्फोटकों के प्रमुख घटक अमोनियम नाइट्रेट की कीमत एक अप्रैल तक 44 प्रतिशत बढ़कर 72,750 रुपये प्रति टन हो गई है। इसके कारण विस्फोटकों की औसत लागत मार्च के अंत तक लगभग 26 प्रतिशत बढ़कर करीब 49,800 रुपये प्रति टन हो गई।
कंपनी की अनुषंगी इकाइयां हर साल करीब नौ लाख टन विस्फोटकों का उपयोग करती हैं और इस पूरी अतिरिक्त लागत को कोल इंडिया खुद वहन कर रही है। डीजल की कीमत भी करीब 54 प्रतिशत बढ़कर 142 रुपये प्रति लीटर हो गई है, जो मार्च के मध्य में लगभग 92 रुपये प्रति लीटर थी। वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी ने करीब 4.19 लाख किलोलीटर डीजल का उपयोग किया।
लागत में बढ़ोतरी के बावजूद कोयले को किफायती बनाए रखने के लिए कंपनी ने कई कदम उठाए हैं। इनमें कुछ ई-नीलामी में आरक्षित मूल्य कम करना, नीलामी की संख्या बढ़ाना और बाजार में अधिक मात्रा उपलब्ध कराना शामिल है। इन उपायों का उद्देश्य उद्योगों और उपभोक्ताओं को बढ़ती ऊर्जा लागत के प्रभाव से बचाना है, ताकि कोयले की कीमतें स्थिर बनी रहें।
अधिकारियों के अनुसार, यदि बढ़ती लागत को सीधे उपभोक्ताओं पर डाला गया, तो इसका व्यापक और क्रमिक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि पश्चिम एशिया संकट से पहले अगस्त, 2025 से जनवरी, 2026 तक अमोनियम नाइट्रेट की कीमतें स्थिर थीं, लेकिन इसके बाद इनमें तेजी आई, जिससे विस्फोटकों की लागत बढ़ गई।

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