आरबीआई ने रेपो दर को यथावत रखा, 2026-27 में वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान

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मुम्बई{ गहरी खोज }: भारतीय रिजर्व बैंक ने वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितता के बीच महंगाई बढ़ने के जोखिम को देखते हुए बुधवार को नीतिगत दर रेपो को उम्मीद के मुताबिक 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा। आरबीआई ने इसके साथ सतर्क रुख अपनाते हुए ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति का रुख अपनाया है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में लगभग 40 दिन चले युद्ध के कारण कच्चे तेल दाम में उल्लेखनीय तेजी आई है। इससे ईंधन के आयात पर निर्भर भारत जैसे देशों के लिए मुद्रास्फीतिक दबाव बढ़ा है। हालांकि, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध विराम से वैश्विक स्तर पर पुनरुद्धार की उम्मीद भी बंधी है।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने छह-सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की छह अप्रैल से शुरू तीन-दिवसीय बैठक में लिए गए इन निर्णयों की जानकारी देते हुए कहा, ‘‘एमपीसी ने आम सहमति से रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखने का निर्णय किया है।’’ उन्होंने कहा कि इसके साथ ही एमपीसी ने मौद्रिक नीति के मामले में ‘तटस्थ’ रुख को बनाये रखा है। इसका मतलब है कि केंद्रीय बैंक आर्थिक स्थिति के हिसाब से नीतिगत दर में समायोजन को लेकर लचीला बना रहेगा। रेपो वह ब्याज दर है, जिस पर वाणिज्यिक बैंक अपनी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिये केंद्रीय बैंक से कर्ज लेते हैं। आरबीआई के रेपो दर को यथावत रखने के फैसले से आवास, वाहन और वाणिज्यिक कर्ज की मासिक किस्त जस-की-तस बने रहने की संभावना है।
सरकार की पिछले महीने आरबीआई के लिए नए मुद्रास्फीति लक्ष्य की घोषणा के बाद यह पहली मौद्रिक नीति समीक्षा है। सरकार ने आरबीआई को मार्च, 2031 तक अगले पांच वर्षों के लिए खुदरा मुद्रास्फीति को दो प्रतिशत घट-बढ़ के साथ चार प्रतिशत पर बनाए रखने की जिम्मेदारी दी है।
मल्होत्रा ने एमपीसी के नीतिगत दर को यथावत रखने के निर्णय के कारणों का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘पिछली नीतिगत बैठक के बाद से, वैश्विक अनिश्चितताएं काफी बढ़ गई हैं। हालांकि, कुल (हेडलाइन) मुद्रास्फीति नियंत्रण में है और लक्ष्य से नीचे है, लेकिन ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि के दबाव और खाद्य कीमतों को प्रभावित करने वाली संभावित मौसम संबंधी गड़बड़ियों के कारण मुद्रास्फीति के दृष्टिकोण के लिए जोखिम बढ़ गए हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मुख्य (कोर) मुद्रास्फीति का दबाव कम बना हुआ है, हालांकि आपूर्ति श्रृंखला में समस्याओं को देखते हुए आने वाले समय में महंगाई की दिशा को लेकर अनिश्चितता है। फरवरी में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति 3.21 प्रतिशत रही जो आरबीआई को दिये गये चार प्रतिशत के लक्ष्य के आसपास है। इसके साथ ही अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले रुपया पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद से चार प्रतिशत से अधिक टूटा है। इससे आयातित मुद्रास्फीति बढ़ने का जोखिम है। हालांकि, संघर्ष विराम की घोषणा के बाद रुपया 50 पैसे चढ़कर 92.56 प्रति डॉलर पर पहुंच गया है।
मल्होत्रा ने कहा, ‘‘फरवरी, 2026 तक के उच्च आवृत्ति संकेतक (जीएसटी संग्रह, पीएमआई, ई-वे बिल आदि जैसे महत्वपूर्ण आंकड़ें) आर्थिक गतिविधियों में मजबूती जारी रहने का संकेत देते हैं। मजबूत निजी उपभोग और निवेश मांग से वृद्धि को निरंतर समर्थन मिल रहा है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि, पश्चिम एशिया संघर्ष आर्थिक वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि से कच्चे माल की ऊंची लागत, अंतरराष्ट्रीय माल ढुलाई और बीमा लागत के साथ-साथ आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान प्रमुख कच्चे माल की उपलब्धता को सीमित कर सकते हैं, जिससे वृद्धि बाधित हो सकती है।’’
मल्होत्रा ने कहा, ‘‘एमपीसी ने इस बात पर गौर किया कि पश्चिम एशिया में संघर्ष की तीव्रता और अवधि और इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा और अन्य बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान मुद्रास्फीति और वृद्धि के लिहाज से जोखिम भरा है। उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद अधिक मजबूत है, जिससे अब इसमें झटकों का सामना करने की क्षमता पहले की तुलना में अधिक है। इसके साथ ही आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है जो वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अनुमानित 7.6 प्रतिशत से कम है।
आरबीआई ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट के कारण जिंस की ऊंची कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के कारण वृद्धि दर में नरमी रह सकती है। नई जीडीपी श्रृंखला (आधार वर्ष 2022-23) के तहत दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, भारत की वास्तविक जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) वृद्धि 2025-26 में 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए खुदरा मुद्रास्फीति 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। इसके अलावा, आरबीआई ने कारोबार सुगमता के लिए भी कदम उठाने की घोषणा की। मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक तीन से पांच जून को होगी।

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