केरल चुनाव: वाम दल सुशासन पर निर्भर, यूडीएफ वापसी की फिराक में, भाजपा को बड़ी सफलता की उम्मीद
तिरुवनंतपुरम{ गहरी खोज }: केरल विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों ने पूरी ताकत झोंक दी है। राज्य में त्रिकोणीय मुकाबला है, जिसमें एलडीएफ, यूडीएफ और एनडीए आमने-सामने हैं। माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ के सामने सत्ता को बरकरार रखने की चुनौती है, जबकि कांग्रेस नीत यूडीएफ वापसी की कोशिश में है और भाजपा नीत एनडीए को बड़ी सफलता की उम्मीद है।
140 सदस्यीय केरल विधानसभा के लिए 9 अप्रैल को मतदान होना है। एलडीएफ (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट), यूडीएफ (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) और एनडीए (नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस), तीनों मोर्चे अपने उम्मीदवारों के नाम तय करने और आखिरी समय में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने की होड़ में लगे हैं।
सत्ताधारी एलडीएफ ने सबसे पहले अपने उम्मीदवारों के नाम जारी किए, जिसके बाद भाजपा और यूडीएफ ने अपनी-अपनी सूचियां जारी कीं। इसके बाद जो मुकाबला देखने को मिला है, वह जितना आंकड़ों पर आधारित है, उतना ही नैरेटिव (कथा) गढ़ने पर भी। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए वे पिछले दस सालों के अपने शासन के कामकाज पर पूरी तरह से निर्भर हैं।
हालांकि, इस चुनाव प्रचार में माकपा के भीतर से उठ रही असंतोष की एक लहर ने मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। जी. सुधाकरन और पी.के. ससी जैसे 5 वरिष्ठ नेता अब विरोधी खेमे में शामिल हो गए हैं। दूसरी ओर, विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने इस मुकाबले को और भी रोमांचक बना दिया है। उन्होंने यह प्रण लिया है कि अगर यूडीएफ 140 सदस्यों वाली विधानसभा में 100 सीटों का आंकड़ा पार करने में नाकाम रहता है, तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे। यूडीएफ को 2024 के लोकसभा चुनावों में अपने शानदार प्रदर्शन, उपचुनावों में मिली लगातार जीतों और दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में अपनी बेहतरीन परफॉर्मेंस से काफी आत्मविश्वास मिला है।
वहीं, राजीव चंद्रशेखर के नेतृत्व में भाजपा 2021 में अपनी एकमात्र सीट (नेमोम) गंवाने के बाद अब वापसी करने की कोशिश कर रही है। चंद्रशेखर, जो 2024 के संसदीय चुनावों में शशि थरूर से हार गए थे, ने यह दावा किया है कि हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में वोट शेयर में मामूली गिरावट के बावजूद अगली विधानसभा में एनडीए की मौजूदगी जरूर होगी। पिछली विधानसभा में लेफ्ट फ्रंट का दबदबा था और उसके पास 99 सीटें थीं, जबकि यूडीएफ के पास सिर्फ 41 सीटें थीं। वहीं विपक्ष का मानना है कि बदलती राजनीतिक हवा और स्थानीय स्तर पर सत्ता विरोधी लहर के चलते कुछ अहम सीटों पर जीत-हार का अंतर काफी कम हो सकता है।
