लक्ष्मी वर्मा को चुप रहकर काम करने का फल मिला
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: भाजपा में चुप रहकर काम करने वालों को उसका फल एक न एक दिन जरूर मिलता है और इस तरह मिलता है और तब मिलता है जब वैसा फल मिलने की उम्मीद नहीं रहती है।राज्य सभा के लिए लक्ष्मी वर्मा का नाम तय हो जाने से साफ हो गया है कि भाजपा में ऐसे लोगों को पसंद किया जाता है और ऊंचा पद दिया जाता है जो हर हाल में चुप रहकर पार्टी का काम ईमानदारी से करते रहते हैं।कई बार मौका मिलने पर उनको विधायक,सांसद प्रत्याशी नहीं बनाए जाने पर भी कोई शिकायत नहीं करता है।लक्ष्मी वर्मा की यह भी खासियत बताई जाती हैं जब पार्टी में उनको कोई पद नहीं दिया जा रहा था तो उऩ पर कांग्रेस प्रवेश का दवाब बढ़ गया था, परिवार कांग्रेसी होने के बाद भी वह भाजपा की राजनीति करती रही और कभी कांग्रेस में जाने को सोचा नहीं। उनकी भाजपा के प्रति यह निष्ठा और चुप रहकर काम करने की आदत भी एक कारण है जिसके कारण उऩको भाजपा का राज्यसभा प्रत्याशी घोषित किया गया है।
माना जा रहा था कि इस बार भाजपा राज्यसभा के लिए किसी महिला को अपना प्रत्याशी बना सकती है, इसके लिए तीन लोगों के नाम था जिसमें एक नाम लक्ष्मी वर्मा का था। सवाल उठना स्वाभाविक है कि भाजपा में कई महिला नेत्रियां ऐसी थीं जिनको राज्यसभा प्रत्याशी बनाया जा सकता था,लक्ष्मी वर्मा को ही क्यों बनाया गया । माना जाता है कि केंद्रीय नेतृत्व ने जातिगत समीकरण के अलावा ओबीसी वर्ग से कुर्मी जाति का प्रतिनिधित्व करती हैं, इसलिए भी उनको राज्यसभा का प्रत्याशी बनाया गया।बताया जाता है कि उनको राज्यसभा प्रत्याशी इसलिए बनाया गया है कि यहां मुख्यमंत्री आदिवासी वर्ग से है,साहू समाज से केंद्रीय मंत्री व उपमुख्यमंत्री बनाए गए हैं,इसलिए राज्यसभा प्रत्याशी कुर्मी समाज से बनाया गया है। राज्य में ओबीसी व आदिवासी समाज का बड़ा महत्व है,दोनों समाज को भाजपा की राजनीति में संतुलित करने से दोनों समाज की स्थिति राज्य राजनीति में मजबूत होती है। इसका फायदा हर तरह के चुनाव में मिल सकता है।
इसके अलावा वह भी जमीन से जुड़ी रही हैं और नीचे से ऊपर आई हैं। बताया जाता है कि उऩका राजनीतिक जीवन जमीनी मुद्दों,सामाजित सरोकारों और महिला सशक्तीकरण के प्रति समर्पण का रहा है।बताया जाता है कि उन्होंने वर्ष १९९४ में रायपुर नगर निगम के वार्ड क्रमांक ७ से पार्षद के रूप में राजनीति के क्षेत्र में कदम रखा। नगर की समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने क्षेत्र में सक्रिय जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी पहचान बनाई। वर्ष २०१० से २०१५तक वह जिला पंचायत रायपुर की अध्यक्ष रहीं।कुर्मी समाज व विभिन्न महिला संगठनों से जुड़ी रहीं। वह महिला मोर्चा में रहीं, भाजपा प्रवक्ता भी रहीं, प्रदेश उपाध्यक्ष पद का दायित्व भी संभाला।उनके नाम की चर्चा विधानसभा चुनाव व लोकसभा चुनाव के वक्त भी रही।उनको टिकट नहीं दिया गया तो उन्होंने कोई शिकायत नहीं की। जब उनका नाम विधानसभा के लिए चला तो उनकी जगह लक्ष्मी बघेल को टिकट दे दिया। दूसरी बार टंकराम वर्मा को टिकट दे दिया गया। इसी तरह जब उनका नाम लोकसभा चुनाव के समय चला तो उनकी जगह बृजमोहन अग्रवाल को टिकट दे दिया गया।इतनी बार टिकट न मिलने पर कोई भी निराश हो जाता लेकिन लक्ष्मी वर्मा कभी निराश नहीं हुई। पार्टी ने जो काम उनको सौंपा वह काम उन्होंने मन लगाकर किया।
राज्य में भाजपा सरकार बनी तो उनको महिला आयोग का सदस्य बनाया गया।वहां उनकी अध्यक्ष किरणमयी नायक से नहीं जमी।लक्ष्मी वर्मा के बारे में यह भी बताया जाता है कि उनका ससुराल व मायका दोनों पक्ष कांग्रेस से जुड़ा रहा है। वह अकेली भाजपा से जु़ड़ी रहीं और उनको कई बार टिकट न मिलने पर भी जुड़ी रही। उन पर शुरू से कांग्रेस से जुड़ने का काफी दवाब रहा लेकिन वह दिल से भाजपा से जुड़ी रहीं और कभी अलग होने को सोचा नहीं।माना जाता है कि यह बात भी केंद्रीय नेतृत्व को पंसद आई कि भाजपा से जुड़ी तो फिर कभी अलग होने को नहीं सोचा, विपरीत स्थिति में भी नहीं सोचा। भाजपा में नेताओं को आजमाया जाता है देखा जाता है कि पद के प्रति निष्ठा है या भाजपा के प्रति निष्टा है. जो चुपचाप भाजपा के प्रति निष्ठावान बना रहता है, उसे समय आने पर बड़ा पद दिया जाता और पार्टी के अऩ्य लोगों को संदेश दिया जाता है कि पार्टी के प्रति निष्टा बनाए रखकर काम करते रहो, पद तो एक दिन आपको बड़ा ही दिया जाएगा।
