जयशंकर ने यांगून में सरसोबेकमैन साहित्यिक केंद्र का किया उद्घाटन

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नई दिल्ली{ गहरी खोज }: विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को म्यांमार के यांगून में सरसोबेकमैन साहित्यिक केंद्र भवन का उद्घाटन किया। यह भारत सरकार की सहायता से निर्मित परियोजना है। उन्होंने कहा कि यह केंद्र भारत-म्यांमार के घनिष्ठ संबंधों का प्रतीक है और म्यांमार की साहित्यिक विरासत के संरक्षण तथा सृजनात्मक लेखन को बढ़ावा देगा।
जयशंकर ने कहा कि भारत और म्यांमार के संबंध सदियों पुराने हैं। दोनों देशों को अध्यात्म, भाषा, साहित्य और भौगोलिक निकटता जोड़ती है। बौद्ध धर्म और पाली भाषा के माध्यम से साझा बौद्धिक विरासत का आदान-प्रदान हुआ। रामायण, भगवद्गीता और तिरुक्कुरल जैसे भारतीय ग्रंथों के बर्मी अनुवाद म्यांमार में लोकप्रिय रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह केंद्र शास्त्रीय और लोकसाहित्य के संरक्षण, अनुवाद, अभिलेखीकरण और शोध गतिविधियों को प्रोत्साहित करेगा। इससे नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ने का अवसर मिलेगा।
विदेश मंत्री ने कहा कि म्यांमार भारत की नेबरहुड फर्स्ट, एक्ट ईस्ट और महासागर सहित इंडो-पैसिफिक प्राथमिकताओं के संगम पर स्थित है। दोनों देशों के बीच राजनीतिक, व्यापारिक, सुरक्षा और सांस्कृतिक सहयोग निरंतर बढ़ रहा है।
उन्होंने संपर्क परियोजनाओं का जिक्र करते हुए कलादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना और भारत‑म्यांमार‑थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग को प्रमुख पहल बताया। उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं के समयबद्ध पूर्ण होने से क्षेत्रीय विकास और जन-जन संपर्क को बढ़ावा मिलेगा।
जयशंकर ने कहा कि भारत ने आपदाओं के समय म्यांमार की सहायता की है। मार्च 2025 में मांडले में आए भूकंप के बाद ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’ के तहत भारत ने लगभग 1000 टन राहत सामग्री भेजी, 80 सदस्यीय खोज-बचाव दल तैनात किया और फील्ड अस्पताल स्थापित किया, जिसमें 2500 से अधिक मरीजों का उपचार किया गया। उन्होंने कहा कि भारत म्यांमार की शांति प्रक्रिया का समर्थन करता है और संघवाद एवं संवैधानिक व्यवस्था के अपने अनुभव साझा करता रहा है। भारत समावेशी, म्यांमार-नेतृत्व वाली शांति प्रक्रिया का पक्षधर है। उल्लेखनीय है कि सरसोबेकमैन म्यांमार की एक प्रमुख साहित्यिक संस्था है, जिसका उद्देश्य देश की साहित्यिक विरासत का संरक्षण और विकास करना है।

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