राज्यों में कांग्रेस नियति है कमजोर बने रहना
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: राजनीति में जो राजनीतिक दल ताकतवर होता है वह कमजोर नही होना चाहता है,वह हमेशा ताकतवर ही बने रहना चाहता है इसलिए वह ऐसे प्रयास करता रहता है कि उनकी ताकत और बढ़े, वह ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता है जिससे उसकी ताकत घटे और उसके कमजोर सहयोगी की ताकत बढ़े। जो दल राज्य में सत्ता में है,अपने दम पर सत्ता में है,वह अपने दम पर सत्ता में बने रहना चाहता है इसलिए सहयोगी दल को वह कम से कम सीटें देता है ताकि वह कमजोर रहे,सरकार में हिस्सेदारी न मांगे, चुनाव में ज्यादा सीटें न मांगे,सरकार बनाने के लिए कुछ सीटें कम पड़ जाए तो वह सहयोगी के दम पर सरकार बना सके। राजनीति का कड़वा सच है यह कि ताकतवर तो कमजोर सहयोगी का उपयोग जैसा चाहे वैसा करना चाहता है लेकिन कमजोर दल ताकतवर दल से अपनी हर बात नही मनवा सकता।
तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव इसी साल होने हैं।यहां इंडी गठबंधन में शामिल राजनीतिक दल द्रमुक की सरकार है,यहां द्रमुक व कांग्रेस व मिलकर चुनाव लड़ते हैं।हमेशा द्रमुक यहां ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ता है और कांग्रेस कम सीटों पर चुनाव लड़ती है।कांग्रेस 1967 के बाद तमिलनाडु में सत्ता में नहीं रही है.द्रमुक के साथ चुनाव लड़ने के बाद भी द्रमुक कांग्रेस को सत्ता में हिस्सा नहीं देता है।आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस ने 1984 में 61 सीटें,1991 में 60 सीटें,2006 में 34 सीटें जीती थी,इसके बाद भी द्रमुक ने उसको सत्ता में हिस्सा नहींं दिया।2021 में द्रमुक ने 173 सीटों में से 133 सीटें जीती और कांग्रेस 25 सीटों में से 18 सीटें जीती थीं। यानी कांग्रेस को द्रमुक ने पहले की तुलना में सीटें देनी कम कर दी है और सत्ता में हिस्सा न देने की परंपरा को बनाए हुए हैं। यानी द्रमुक ऐसा कुछ करना नहींं चाहता है कि कांग्रेस किसी भी तरह से खुद तो तमिलनाड़ु में मजबूत कर सके।
देश में ऐसे कई राज्य हैं जहां कभी कांग्रेस सत्ता में रहा करती थी यानी वह सबसे शक्तिशाली थी। उसे हटाकर ही क्षेत्रीय दलों ने राज्य में अपने को मजबूत किया है। क्षेत्रीय दल जानते हैं कि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है,वह राज्य में शासन कर चुकी है, उसका अपना जनाधार रहा है.वह राज्य में जैसे ही मजबूत होगी तो उसका जनाधार मजबूत हो सकता है।इसलिए क्षेत्रीय दलउसे किसी भी तरह से मजबूत होने का कोई मौका नहीं देना चाहते है। कांग्रेस तमिलनाडु ही नहीं बिहार,यूपी जैसे बड़े राज्यो में भी सत्ता से बाहर होने के बाद से कमजोर बनी हुई है यानी क्षेत्रीय दलों के रहमोकरम पर मुश्किल से अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं।वह जब भी चुनाव आता है तो क्षेत्रीय दलों से ज्यादा सीटें चुनाव लड़ने के लिए मांगती है लेकिन क्षेत्रीय दल देते नहीं है, बिहार मे उसने यही किया।वह क्षेत्रीय दल की मर्जी के बिना ६१ सीटों पर चुनाव लड़ी, इससे क्षेत्रीय दल को नुकसान हुआ और कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ।वह बिहार में ६१ में से सीटें ही जीत सकीं।
तमिलनाडु में कांग्रेस पिछले चुनाव में 25 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 18 सीटों पर चुनाव जीती थी। इस साल तमिलनाड़ु में विधानसभा के चुनाव होने हैं,कांग्रेस चाहती है कि विधानसभा चुनाव से पहले सीटों पर बात शुरू हो जानी चाहिए। द्रमुक की तरफ से इसमें देरी की जा रही है। कांग्रेस के पर्यवेक्षक यहां गठबंधन सरकार का बयान दे रहे हैं.कांग्रेस नेता खुले तौर पर सरकार में कांग्रेस की भूमिका की मांग कर रहे हैं यानी इस बार द्रमुक की सरकार बनती है तो कांग्रेस चाहती है कि उसे सत्ता में हिस्सा मिलना चाहिए।
कांग्रेस को सत्ता मे तब ही हिस्सा मिल सकता है जब ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़े और ज्यादा सीटें जीते। वह जानती है कि कम सीटों पर चुनाव लड़ने से वह ज्यादा सीटें नहीं जीत सकती, कम सीटें ही जीत सकती है, इसलिए वह इस बार पिछली बार की २५ सीटों से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है वह कम से कम ४५ सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। जब भी सीटों पर बात होगी तो माना जा रहा है कि वह द्रमुक से ज्यादा सीटों की मांग इस आधार पर करेगी कि पिछली बार वह ज्यादा सीटों पर जीती थी इसलिए उसे इस बार कम से कम २० सीटे ज्यादा चुनाव लड़ने के लिए दी जानी चाहिए।राहुल गांधी कांग्रेस के सबसे बड़े राष्ट्रीय नेता भले हो लेकिन राज्य के नेता उनको बड़ा नेता मानते नहीं है क्योंकि वह कांग्रेस को चुनाव जिता नहीं पाते हैं। निरंतर चुनाव हारने से उनका राजनीतिक कद ऊँचा नहीं हो पाता है।
