सामान्य वर्ग का गुस्सा,एकजुट होने के संकेत भी है

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सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }:
किसी समाज की ताकत का पता उसकी संख्या से तो लगता ही है, अपने अहित में उठाए गए सरकार या किसी संस्था के खिलाफ सामने आए उसके गुस्से से भी पता चलता है कि समाज अपने हित व अहित को लेकर कितना एकजुट है,कितना जागरूक है। इससे देश के सभी राजनीतिक दलों,अन्य संगठनों व संस्थाओं को भी इस बात का पता चलता है कि समाज की ताकत क्या है और वह क्या कर सकता है। सभी राजनीतिक दलों,संस्थाओं,संगठनों को उनका गुस्सा संदेश होता है कि हमारी उपेक्षा की या हमारे खिलाफ किसी ने भी कुछ किया तो वह नुकसान में रहेगा। यूजीसी के नए नियमोंं को लेकर सामान्य वर्ग या हिंदू समाज ने देश मे जिस तरह से अपने गुस्सा जाहिर किया उससे यह तो साफ हो गया है कि २०१४ के बाद हिंदू समाज अपनी एकजुटता को लेकर जागरूक है तथा उसके खिलाफ उठाए गए किसी भी कदम का वह कड़ा विरोध करता है।
अब तक देश में कांग्रेस व वामपंथियों का एक इकोसिस्टम हुआ करता था और वह भाजपा व हिंदू संगठनों के खिलाफ निरंतर एक अभियान चलाया करता था कि यह लोग जो कुछ सोचते है, गलत सोचते हैं, जो कुछ करते हैं गलत करते हैं। यह लोग देश की एकता,समरसता के खिलाफ है। यह लोग सांप्रदायिक है,यह लोग समाज को बांटने वाले हैं, यह लोग समाज में नफरत फैलाने वाले हैं।यह लोग लोग मुसलमान-दलित विरोधी हैं। यह लोग सत्ता में आएंगे तो देश की एकता अखंडता खतरे मे आ जाएगी,देश में अमन चैन नहीं रहेगा। यह इकोसिस्टम रोज-रोज यही दोहराता था और लोगों के लगता था कि यह लोग तो बुध्दिजीवी हैं, यह तो शिक्षित तबका है, यह झूठ कैसे कह सकता है, यह जो कह रहा है सच कह रहा है। देश के लोग इनकी बातों पर भरोसा भी करते थे यही वजह है कि जिनका इकोसिस्टम था है वह कई दशकों तक सत्ता में रहे।
इस इकोसिस्ट्म का कई दशकों तक एकाधिकार था, इसकी बातों का कोई जबाब देने वाला नहीं था, यह लोग जो कहते थे उसे अंतिम सत्य मान लिया जाता था। यही वजह है कि इस इकोसिस्टम को बनाने वालों की सत्ता को कई दशक तक कोई चुनौती देने वाला नहीं था, यह एक तिलस्म खड़ा करने में सफल रहे थे कि उनको ही शासन करना आता था,कोई दूसरा या बहुत सारे दल मिलकर कभी सत्ता पर आ जाते थे कि यही इकोसिस्टम यह प्रचार करता था कि यह शासन चलाने योग्य नहीं है यह शासन नहीं चला सकते और साजिश करके मिली जुली सरकार गिरा दी जाती थी और फिर प्रचार किया जाता था कि देखो हम न कहते थे कि इनको शासन करना नहीं आता है।सरकार चलाना नहीं आता है। कई दशकों तक इकोसिस्टम चलाने वाले जानते थे कि बहुसंख्यक हिंदू समाज एकजुट रहा तो उनकी सत्ता को खतरा होगा, इसलिए हिंदू समाज के एससी,एसटी, पिछड़ा वर्ग व सामान्य में बांट दिया था और उनको एक दूसरे के खिलाफ लड़ाकर उनको एक नहीं होने दिया। यह इकोसिस्टम हिंदू समाज के खिलाफ था और बंटे हुए हिंदू समाज का अपना कोई इकोसिस्टम नही था इसलिए वह इनका मुकाबला करने में कमजोर पड़ता था।
२०१४ में हिंदू समाज को मोदी के आने के बाद लगा कि अब उनको एकजुट करने वाला आ गया है,अब उनको एकजुट होना चाहिए और सत्ता पर उनका ही अधिकार होना चाहिए। मोदी सरकार आने के बाद हिंदू समाज के जिस इकोसिस्टम की जरूरत थी आज दस साल में खुशी की बात है कि वह इकोसिस्टम बन गया है और इसका लाभ भी हिंदू समाज को मिल रहा है। इस इकोसिस्टम के बनने से हिंदू समाज पहले ज्यादा शक्तिशाली हुआ है और अपना विरोध पहले से व्यापक तोर पर दर्ज भी करा रहा है।यह खुलकर कहने लगा है कि यह हमारे खिलाफ है, हम इसका विरोध करते है, इससे बदला जाए और इसकी जगह नया कानून बनाया जाए। हमें शोषक,भेदभाव करने वाला कहा जाए या माना जाए यह हमें मंजूर नहीं है, यह देश हमारा है और कोई हमारी उपेक्षा अब नहीं कर सकता। हमारे साथ कोई भेदभाव हो यह हमें मंजूर नहीं है।
हिंदू समाज ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करते वक्त भी विरोध किया था,तब गुस्से में बहुत कुछ ऐसा हुआ था,जो नहीं होना चाहिए था।जब तक पिछड़ा वर्ग को आरक्षण नहीं मिलता था वह सामान्य वर्ग ही माना जाता था।उसे आरक्षण देकर सामान्य वर्ग को कमजोर कर दिया गया था। यानी हिंदू समाज का और बांटकर उसे और कमजोर कर दिया था, हिंदू समाज ने इसका विरोध किया था,लेकिन तब की सरकारे और तब ठीक मानी जाने वाली विचाऱधारा के चलते सामान्य वर्ग के विरोध के बाद भी पिछड़ो का आरक्षण देकर हिंदू समाज को कमजोर कर दिया गया ताकि वह सत्ता का फैसला करने में कोई अहम भूमिका न निभा सके। लेकिन इस बार यूजीसी के नए नियम ने हिंदू समाज का मौका दिया तो उसने बता दिया है कि वह अब एकजुट है और उसका इकोसिस्टम बहुत अच्छे से हिंदू समाज का एकजुट करने का काम कर रहा है। इसी इकोसिस्टम के कारण इस बार हिंदू समाज की बात जल्द मान ली गई है। मान लिया गया है कि हिंदू समाज जो चाहता है वही देश व समाज के लिए ठीक है।

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