हादसा मतलब कहीं न कहीं चूक तो हुई है
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }:कहीं भी कोई हादसा होता है तो इसका साफ मतलब होता है कि कहीं न कहीं चूक तो हुई है। हर हादसे के बाद जांच होती है, हादसा क्यों हुआ पता चलता है, वैसी चूक न हो इसका प्रयास भी किया जाता है लेकिन हादसे रुकते नहीं है। हादसे में आम लोग भी मारे जाते हैं और खास लोग भी मारे जाते हैं।इससे घर,परिवार,राज्य व देश का नुकसान तो होता ही है। इसके बाद भी हादसों पर रोक नहीं लगती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि हादसों पर रोक क्यों नही लगती है, आखिर हादसों में आम लोग व खास लोग कब तक मारे जाते रहेंगे।महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का प्लेन क्रैश होने पर उनकी मौत के बाद फिर से यह सवाल पैदा हो गया है कि वीवीआईपी की सुरक्षा में बार बार चूक कैसे हो जाती है और असमय एक परिवार,एक राज्य अपना बड़ा नेता खो देता है। परिवार व राज्य को ऐसी क्षति हो जाती है जिसका भरपाई नहीं हो सकती।
यह पहली बार नहीं है कि जब भारत में हुए विमान या हैलिकाप्टर हादसे में किसी परिवार ने अपना मुखिया या राज्य ने अपना बड़ा नेता खोया है। इससे पहले इसी तरह के हादसों में संजय गांधी,माधवराव सिंधिया,जीएमसी बालोयोगी,वायएस राजशेखर रेडडी,सीडीएस विपिन रावत,होमी जहांगीर भाभा,विजय रूपाणी आदि वीवीआईपी की मौत हो चुकी है।हर हादसे के बाद यह सवाल उठता रहा है कि क्या वीवीआईपी उडा़नों में जोखिम प्रबंधन उतना अच्छा है जितना दावा किया जाता है।यह सच हो सकता है कि हर हादसा एक पल की गलती का परिणाम हो सकता है। पर यह भी सच है कि विमानन उद्योग का जितनी तेजी से विस्तार हो रहा है उतनी ही तेजी से सुरक्षा के प्रबंधन हर हवाई अड्ड् पर हो नहीं हो पा रहे हैं।हर हादसे के बाद शोक तो व्यक्त किया जाता है,जांच भी होती है,जांच रिपोर्ट भी आती है लेकिन क्या व्यवस्थागत सुधार स्थायी रूप से लागू होते हैं।ऐसा होता नहीं है इसलिए हादसे होते रहते हैं।जरूरत है कि निजी चार्टर विमान कंपनियों पर भी वही नियम सख्ती से लागू होने चाहिए जो वाणिज्य उड़ानों पर भी लागू होते हैं। ऐसे हादसे रोकने के लिए नागर विमानन मंत्रालय को नेशलन वीवीआईपी एयर सेफ्टी पालिसी बनानी चाहिए और लागू भी करनी चाहिए।
अजित पवार महाराष्ट सरकार में छह बार उप मुख्यमंत्री रहे।वह कांग्रेस,शिवसेना व भाजपा तीनों सरकार में डिप्टी सीएम रहे। उनका सपना महाराष्ट्र का सीएम बनने था,वह उनके निधन से अधूरा रह गया है।वह लंबे समय तक पवार की छत्रछाया में राजनीति करते रहे। उनकी सीएम बनने या डिप्टी सीएम बनने की महत्वाकांक्षा के चलते जब भाजपा महाराष्ट्र में मजबूत हुई तो उन्होंने शरद पवार से बगावत करने व पार्टी तोड़ने का साहस किया।२०२३ में वह शरद पवार से अलग होकर नई पाटी बनाई और नया चुनाव चिन्ह हासिल किया और २४ के विधानसभा चुनाव में उन्होंने ४१सीटें जीतकर महाराष्ट्र की राजनीति अपनी एक अलग जगह बनाई और साबित किया कि अब महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार के अलावा वह भी एक बड़े खिलाड़ी हैं और सरकार बनाने व बिगाडऩे में उनकी भी अहम भूमिका है।
महाराष्ट्र के लोकप्रिय नेता अजित पवार के असामयिक निधन से महाराष्ट्र की सियासत में एक ऐसा खालीपन आ गया है जिसके आसानी से भरने की उम्मीद नहीं है। इसका असर महाराष्ट्र की सत्ता,संगठन व गठबंधन पर पड़ेगा।महायुति सरकार में अजित पवार एक पावर संतुलित करने वाले नेता थे। उनके रहने से यह सत्ता में एक संतुलन बना हुआ था, उनके न रहने से यह संतुलन गड़बड़ा सकता है। भाजपा के लिए अजित पवार एक सियासी सहारा था, यह सियासी सहारा भाजपा को फिर से खोजना पड़ेगा। अजित पवार के रहते डिप्टी सीएम एकना। शिंदे भी जानते थेे वह अपनी किसी बात को मानने के लिए सरकार को मजबूर नहीं कर सकते । अब अजित पवार के न रहने पर एकनाथ शिंदे पर सरकार की निर्भरता और बढ़ जाएगी तो वह भी अपने हित के लिए सरकार पर और ज्यादा दवाब डाल सकते हैं अपनी बात मनवाने के लिए।
अजित पवार के न रहने से आगे क्या होगा, इसे लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है।एक संभावना यह है कि उनकी पत्नी व बेटे राजनीति में सक्रिय भूमिका निबाह सकते हैं।इसमें भाजपा उनका सहयोग कर सकती है।इसके अलावा यह भी माना जा रहा है कि शरद पवार फिर से राजनीति के केंद्र में आ जाएंगे। वह दोनों गुटों को एक करने का प्रयास कर महाराष्ट्र की राजनीति में फिर से अपने आपको अहम खिलाड़ी बनाने का प्रयास कर सकते हैं। अगर दोनो गुट मिल जाते हैं तो एनसीपी के लोकसभा में ८ सांसद और महाराष्ट्र में विधायकों की संख्या ५१ हो जाएगी और शरद पवार राज्य ही नहीं केंद्र की राजनीति में भी असर डालने वाले हो जाएंगे। अजित पवार के रहने से महाराष्ट्र की सियासत तो जरूर बदलेगी और कौन कितना अहम होगा यह आने वाले समय मे पता चलेगा।
