फिर सवर्णों को भड़काने की कोशिश की जा रही
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: देश में बहुत सारे राजनीतिक दल है, स्वाभाविक है कि वह जहां भी राजनीतिक फायदा दिखेगा वह राजनीति जरूर करेंगे।राजनीति का काम ही समाज को टुकड़ों में बांटते जाना है। समाज के छोटे-छोटे टुकड़े कर देना है। उसको जाति में बांट कर रखना है, उसको अगड़ा-पिछड़ा में बांट कर रखना है।सवर्ण और दलित में बांटना कर रखना है।वहीं देश में बहुत सारे धार्मिक लोग है, साधु संत हैं,वह समाज को जोड़ने का काम करते रहते हैं।वह कहते हैं कि तुम सब जाति में मत बंटों, तुम सब हिंदू हो, तुम सब सनातनी हो।यह दोनों काम देश मे चलता रहता है,एक तरफ देश व समाज को जोड़ने का काम चलता रहता है तो एक तरफ मौका मिलते ही समाज को तोड़ने का काम शुरू हो जाता है। यूजीसी के कुछ नए नियम इन दिनों चर्चा में हैं, उसे लेकर जो कुछ कहा जा रहा है, उससे तो ऐसा लगता है कि अगड़ों व सवर्णों को फिर एक बार भड़काने की कोशिश हो रही है।
कई सालों बाद अगड़ों को सामान्य वर्ग के लोगों को यूजीसी के कुछ नए नियमों को लेकर भड़काने की कोशिश की जा रही है। उनमें गुस्सा पैदा करने की कोशिश की जा रही है।ठीक वैसा ही गुस्सा जैसा एक समय मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करते समय पैदा हुआ था।इसके तहत ओबीसी को सरकारी नौकरी में २७ प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था थी।इसके विरोध देश भर में हिंसक विरोध हुआ था। सामान्य वर्ग के युवाओं ने विरोध में आत्मदाह भी किया था। इन दिनों यूजीसी की देश भर की यूनिवर्सिटी व कालेजों में होने वाले जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए नए नियम बनाए हैं। इस नये नियम के अनुसार जातिगत भेदभाव के मामले में एक कमेटी बनाई जाएगी जो एससी,एसटी ओबीसी छात्रों की शिकायते सुनेगी।तय समय में उसका समाधान करेंगी।कमेटी में एससी,एसटी,ओबीसी,दिव्यांग और महिलाओं का होना अनिवार्य है।कमेटी का काम कैंपस में बराबरी का माहौल बनाना है और ओबीसी के लिए योजनाएं लागू करना है।
यूजीसी का यह नियम बनाया इसलिए गया है कि जातिगत भेदभाव की समस्या का समाधान हो सके। कुछ लोग इस समस्या के समाधान की कोशिश को ही यह कहकर समस्या बनाने का प्रयास कर रहे हैं, सामान्य वर्ग के लोगों को भड़काने का प्रयास कर रहे हैं कि यह नियम सवर्णों व सामान्य वर्ग के लोगों के खिलाफ है।कहा जा रहा है कि नियमों में सिर्फ एससी,एसटी व ओबीसी के खिलाफ भेदभाव की बात कही गई है। जनरल लोगों के खिलाफ भेदभाव को भेदभाव ही नहीं माना जाएगा,सामान्य वर्ग के लोगों को डराया जा रहा है कि इन नियमों का फायदा उठाकर कोई भी छात्र सामान्य छात्र को फंसा सकता है, उसकी शिक्षा में बाधा पैदा कर सकता है। अभी ऐसा कुछ हुआ नहीं है लेकिन अभी से नियमों का विरोध शुरू हो गया है।जब होगा तब इस बात को जोरशोर से उठाया जाता तो यूजीसी इस समस्या के समाधान का भी कोई रास्ता निकालता है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेद्र प्रधान ने इस मामले में साफ तौर पर कहा है कि यूजीसी के नए नियमों से किसी को भी किसी प्रकार की उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ेगा,किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा।इसके बाद भी खासकर यूपी में यूजीसी के नए नियमों का सबसे ज्यादा विरोध किया जा रहा है या कहा जा सकता है कि राजनीति शुरू कर दी गई है। इस मामले को तूल देने के लिए सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने पद से इस्तीफा दे दिया है।यह सामान्य वर्ग के लोगों को इस मामले में भड़काने की कोशिश है,उकसाने की कोशिश है सरकार पर दवाब बढ़ाने के लिए दूसरे सवर्ण भी अपने पद से इसी तरह इस्तीफा देकर विरोध जताएं।यह सामान्य वर्ग के लोगों का खुद को नेता बनाने की कोशिश है।यह जताने की कोशिश है कि मैं जो कह रहा हूं, वही सही है, मैंने जो किया है वही सही है।
इस मामले में अभी बड़े राजनीतिक दल सामने नहीं आए हैं क्योंकि वह जानते हैं कि किसी एक का पक्ष लेने से उनको राजनीतिक नुकसान हो सकता है लेकिन यह तो तय है कि यह जो किया जा रहा है कि इसलिए किया जा रहा है कि यूपी के चुनाव में इसे मुद्दा बनाकर भाजपा को नुकसान पहुंचाया जाए।सब जानते हैं कि सामान्य वर्ग के लोग भाजपा को ज्यादा वोट देते हैं,इसलिए सामान्य वर्ग को भाजपा के खिलाफ करने के लिए यह सब किया जा रहा है। अब अगर सरकार यूजीसी के नियम बदलती है तो राजनीति करने वाले सरकार को दलित,पिछड़ा विरोधी बताएंगे और सरकार नियम नहीं बदलती है तो भाजपा को वोट बैंक सामान्य वर्ग को भाजपा के खिलाफ भड़काया जाएगा कि देखों तुम लोग भाजपा को वोट देते हो और भाजपा सरकार तुम्हारे खिलाफ नियम बनाती है।यूजीसी के नए नियमों का विरोध सरकार को मुश्किल मे डालने के लिए किया जा रहा है।
