मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स ने ट्रंप की टैरिफ वाली राजनीति को दिया तगड़ा जवाब

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लेख-आलेख { गहरी खोज }: भारत और यूरोपीय संघ के बीच लंबे इंतजार के बाद मुक्त व्यापार समझौता आखिरकार संपन्न हो गया। इसे दोनों पक्षों ने मदर ऑफ ऑल डील्स कहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा के साथ इस समझौते के राजनीतिक ऐलान पर हस्ताक्षर और आदान प्रदान हुआ। इस अवसर पर यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष ने कहा कि आज भारत और यूरोप इतिहास बना रहे हैं। यह समझौता दो अरब लोगों का मुक्त व्यापार क्षेत्र तैयार करता है जिससे दोनों पक्षों को लाभ होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह केवल शुरुआत है और रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत किया जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर को भारत के आर्थिक भविष्य के लिए निर्णायक बताते हुए कहा कि भारत और यूरोपीय संघ मिलकर वैश्विक जीडीपी का लगभग पच्चीस प्रतिशत और दुनिया के कुल व्यापार का करीब एक तिहाई हिस्सा रखते हैं। उन्होंने कहा कि यह समझौता एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों और करोड़ों यूरोपीय नागरिकों के लिए नए अवसर खोलेगा।
हम आपको बता दें कि इस मुक्त व्यापार समझौते के तहत यूरोपीय संघ अपने लगभग 97 प्रतिशत वस्तु निर्यात पर भारत में शुल्क हटाएगा या कम करेगा। इससे हर साल करीब चार अरब यूरो की बचत होगी। भारत के लिए इसका मतलब है कि यूरोपीय कारें, बीयर, जैतून का तेल और प्रोसेस्ड फूड सस्ते होंगे। वहीं भारत को कपड़ा, चमड़ा, समुद्री उत्पाद और कई श्रम आधारित क्षेत्रों में शुल्क मुक्त या रियायती पहुंच मिलेगी। देखा जाये तो भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते के बाद भारत में कई यूरोपीय उत्पाद सस्ते होने की संभावना है। इस समझौते के तहत यूरोप से आयात होने वाली प्रीमियम कारों पर शुल्क में कटौती होगी जिससे बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज जैसी गाड़ियां पहले के मुकाबले कम कीमत पर उपलब्ध हो सकेंगी। यूरोपीय शराब, बीयर और वाइन पर भी टैक्स घटेगा जिससे ये उत्पाद आम उपभोक्ताओं के लिए अधिक सुलभ होंगे। इसके अलावा, चॉकलेट और अन्य खाद्य वस्तुएं भी सस्ती हो सकती हैं। साथ ही मेडिकल उपकरण, ऑप्टिकल मशीनें और उन्नत तकनीकी सामान पर शुल्क हटने से स्वास्थ्य सेवाओं और उद्योगों की लागत कम होगी। वहीं रत्न, आभूषण और प्लास्टिक जैसे क्षेत्रों में शून्य शुल्क का लाभ मिलने से इन उत्पादों की कीमतों पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा और घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
समझौते के तहत मशीनरी, रसायन और दवाओं पर ऊंचे शुल्क लगभग खत्म हो जाएंगे। विमान और अंतरिक्ष उपकरणों पर भी शुल्क हटाने का रास्ता साफ हुआ है। यूरोपीय संघ का अनुमान है कि इससे वर्ष 2032 तक उसका भारत को निर्यात दोगुना हो सकता है। साथ ही दोनों पक्षों ने व्यापार के साथ सुरक्षा और रक्षा साझेदारी की भी घोषणा की है। यूरोपीय संघ ने अगले दो वर्षों में पांच सौ मिलियन यूरो की सहायता से भारत के हरित ऊर्जा और जलवायु प्रयासों को समर्थन देने की बात भी कही है। यह समझौता केवल आर्थिक नहीं बल्कि जलवायु और रणनीतिक आयाम भी रखता है। हम आपको यह भी बता दें कि इस समझौते के लागू होने में अभी कुछ समय लगेगा और इसके 2027 की शुरुआत में प्रभावी होने की संभावना है।
देखा जाये तो भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ यह मुक्त व्यापार समझौता बदलती वैश्विक राजनीति में एक स्पष्ट संदेश भी है। यह संदेश खास तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दबाव और टैरिफ आधारित नीति के लिए करारा झटका है। बीते वर्षों में अमेरिका ने व्यापार को हथियार की तरह इस्तेमाल किया। ऊंचे शुल्क धमकियां और सहयोगियों पर दबाव ट्रंप की पहचान बन गई। भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर अतिरिक्त शुल्क और यूरोप पर लगातार दबाव इसी नीति का उदाहरण हैं। ऐसे माहौल में भारत और यूरोपीय संघ का एक दूसरे के साथ इतनी व्यापक डील करना यह दिखाता है कि दुनिया अब दबाव नहीं बल्कि साझेदारी चाहती है।
यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापार वार्ता ठंडी पड़ी हुई है। यूरोप ने साफ कर दिया कि वह अपमान और धमकी की राजनीति के आगे नहीं झुकेगा। भारत ने भी अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताओं में कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अपनी लाल रेखा स्पष्ट रूप से सामने रखी है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति ने पिछले एक दशक में आत्मविश्वास और व्यवहारिकता का नया मेल दिखाया है। भारत ने अमेरिका, यूरोप, रूस और एशिया सभी के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध रखे। भारत न तो किसी दबाव में झुका और न ही टकराव की भाषा अपनाई। यही कारण है कि यूरोपीय संघ जैसा जटिल समूह भारत के साथ इतने व्यापक समझौते पर सहमत हुआ।
सामरिक दृष्टि से यह समझौता वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को विविध बनाने में मदद करेगा। चीन पर निर्भरता कम करने और सुरक्षित सप्लाई चेन बनाने की यूरोप की जरूरत भारत को स्वाभाविक साझेदार बनाती है। यह समझौता भारत के लिए तकनीक निवेश और रोजगार का नया रास्ता भी खोलता है। साथ ही रक्षा और सुरक्षा सहयोग से हिंद प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता को भी बल मिलेगा। यह डील यह भी दिखाती है कि व्यापार समझौते केवल आर्थिक लाभ के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक संतुलन के लिए भी होते हैं। भारत और यूरोप दोनों ही यह संकेत दे रहे हैं कि वह बहुध्रुवीय दुनिया में स्वतंत्र फैसले लेने को तैयार हैं। ट्रंप की टैरिफ नीति के उलट यह समझौता संवाद, विश्वास और सम्मान पर टिका है।
बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि भारत और यूरोपीय संघ का यह मुक्त व्यापार समझौता नई वैश्विक व्यवस्था की झलक है। जहां दबाव की जगह साझेदारी है और धमकी की जगह भरोसा। मोदी सरकार की विदेश नीति ने भारत को इस मुकाम पर पहुंचाया है जहां वह न केवल अपने हितों की रक्षा करता है बल्कि वैश्विक स्थिरता में भी निर्णायक भूमिका निभाता है। यही इस ऐतिहासिक समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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