यूएनएचआरसी में भारत का अलग रुख, ईरान के खिलाफ प्रस्ताव का किया विरोध

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नई दिल्ली{ गहरी खोज }: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) के 39वें विशेष सत्र में शुक्रवार को भारत ने पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका को चौंकाते हुए ईरान के पक्ष में खुलकर रुख अपनाया। ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर पश्चिमी देशों द्वारा पेश किए गए निंदा प्रस्ताव के खिलाफ भारत ने मतदान किया और तटस्थ रहने की अपनी पारंपरिक नीति से हटकर सीधा विरोध दर्ज कराया।
पश्चिमी देशों की ओर से प्रस्ताव संख्या ए/एचआरसी/एस/एल.1 पेश किया गया था, जिसका उद्देश्य ‘इस्लामी गणराज्य ईरान में मानवाधिकारों की बिगड़ती स्थिति’ की निंदा करना था। खासतौर पर पिछले महीने ईरान में हुए विरोध प्रदर्शनों और बड़ी संख्या में मौतों को आधार बनाकर यह प्रस्ताव लाया गया। पश्चिमी देशों का कहना था कि ईरान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त रुख अपनाया जाना चाहिए।
47 सदस्यीय परिषद में हुए मतदान में 25 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया, जबकि 14 देश तटस्थ रहे। भारत समेत सात देशों ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। भारत के साथ चीन, पाकिस्तान, इराक, वियतनाम, इंडोनेशिया और क्यूबा ने भी विरोध में वोट डाला। मतदान के दौरान परिषद का माहौल तनावपूर्ण रहा और नतीजों में दुनिया दो धड़ों में बंटी नजर आई।
यह एक दुर्लभ अवसर रहा, जब भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश एक ही पक्ष में खड़े दिखाई दिए। आमतौर पर भारत ऐसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर तटस्थ रहना पसंद करता है, लेकिन इस बार उसने सीधे प्रस्ताव का विरोध कर स्पष्ट संकेत दिया।
प्रस्ताव के समर्थन में फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, अर्जेंटीना, कोस्टा रिका और चिली जैसे देशों ने मतदान किया। वहीं ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, कतर, कुवैत, मलेशिया और बांग्लादेश समेत 14 देशों ने तटस्थ रहने का विकल्प चुना।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का यह कदम उसकी विदेश नीति में बदलते रुख का संकेत है। अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ और दोनों देशों के बीच बढ़े तनाव के बीच भारत ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह पश्चिमी दबाव में नहीं आएगा। ईरान के साथ भारत के लंबे समय से रणनीतिक और ऊर्जा संबंध रहे हैं। चाबहार बंदरगाह जैसी अहम परियोजनाओं और ऊर्जा जरूरतों के चलते ईरान भारत के लिए महत्वपूर्ण साझेदार रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने इस मतदान के जरिए यह भी स्पष्ट किया है कि वह मानवाधिकारों के नाम पर किसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और दोहरे मापदंडों का विरोध करता है। हालांकि, बहुमत मिलने के कारण यह निंदा प्रस्ताव मानवाधिकार परिषद में पारित हो गया।

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