रूस-चीन की दिलचस्पी सैनिक कार्रवाई रही नहीं

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उमेश चतुर्वेदी
लेख-आलेख { गहरी खोज }:
साल 2026 के तीसरे ही दिन अमेरिका ने जिस तरह वेनेजुएला के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की, उसके बाद से विशेषकर सैनिक रूप से कमजोर देशों में चिंता की लहर है। चाहे अमेरिकी खेमे में हो या फिर अमेरिका विरोधी खेमे में, हर देश आशंकित हो उठा है। अमेरिका के सर्वोच्च पद पर डोनॉल्ड ट्रंप के रहते ऐसी चिंताएं स्वाभाविक भी हैं। जिस तरह अपने ही खेमे के देश डेनमार्क के ग्रीनलैंड द्वीप पर ट्रंप ने अपनी नजर टिका रखी है, उससे दुनिया को चिंतित होना ही चाहिए। ऐसे में विश्व की निगाह दुनिया के सैनिक रूप से दूसरे शक्तिशाली देश रूस और आर्थिक रूप से दूसरे और सैनिक रूप से तीसरे ताकतवर देश चीन पर लगना स्वाभाविक है। लेकिन दोनों ही देशों ने वेनेजुएला पर जिस तरह रस्मी प्रतिक्रिया जताई है, उससे लगता नहीं कि वे भविष्य में ऐसी अमेरिकी कार्रवाइयों के खिलाफ अपने मित्र देशों के पक्ष में खड़े होने आएंगे।
पिछली सदी के आखिरी दशक तक, जब तक सोवियत संघ अस्तित्व में रहा, कम से कम दुनिया के कमजोर और साधनहीन देशों को उम्मीद रहती थी कि अगर अमेरिका ने उनकी ओर आंख तरेरी तो सोवियत संघ का साथ मिलेगा और अगर सोवियत संघ ने निगाहें तीखी कीं तो अमेरिका उसकी मदद करने पहुंचेगा। सोवियत संघ के विघटन के बाद उसका सबसे बड़ा हिस्सा रूस शक्तिशाली तो बना रहा है, लेकिन मौजूदा अमेरिका-ब्रिटेन प्रेरित-पोषित आर्थिक दुनिया में सोवियत संघ जैसी ताकत बना नहीं रह सका। सोवियत संघ के वजूद में रहते तक विश्व में खुलेतौर पर दो दुनिया थी और दो मुद्राओं का जोर भी था। बेशक डॉलर, सोवियत और आज के रूस की मुद्रा रूबल की तुलना में ताकतवर था, लेकिन ऐसा भी नहीं था कि आर्थिक रूप से पूरी दुनिया को नियंत्रित कर सके। लेकिन आज आर्थिक क्षेत्र में डॉलर को कोई चुनौती नहीं है। ब्रिक्स देशों ने अपनी-अपनी मुद्राओं को आपसी आर्थिक व्यवहार में आगे बढ़ाने की कोशिश तो की है, हालांकि वह डॉलर को चुनौती देने की स्थिति में नहीं आ पाई हैं। अमेरिका जानता है कि उसकी आर्थिक ताकत को बड़े स्तर पर चुनौती देने की हालत में दुनिया की दूसरी यानी चीन की अर्थव्यवस्था नहीं है, इसलिए ट्रंप बेफिक्र होकर कभी मैक्सिको को अपना उपनिवेश बनाने की वकालत करते हैं तो कभी कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने का ऐलान करते हैं। ग्रीनलैंड पर निगाह और वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई उनकी इसी सोच का विस्तार है।
वेनेजुएला पर कार्रवाई को लेकर रूस और चीन ने चिंताएं तो जाहिर कीं, लेकिन वे वेनेजुएला को सैनिक सहयोग करने के लिए इच्छुक नहीं दिखे। इसकी मोटे तौर पर दो वजहें सामने आती हैं। वेनेजुएला से रूस ने 2010 में समझौता तो किया, लेकिन वह रणनीतिक, तकनीकी और आर्थिक मामलों पर केंद्रित है। सैनिक सहयोग की बात उसमें नहीं है। दिलचस्प यह है कि वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार का सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाला चीन भी इस मामले में उसको सैनिक सहयोग करने से दूर है। वेनेजुएला के तेल निर्यात का 50 से 89 प्रतिशत तक हिस्सा सिर्फ चीन जाता था। मोटे तौर पर चीन रोजाना वेनेजुएला से चार लाख बैरल से लेकर छह लाख साठ हजार बैरल तेल आयात कर रहा था। इसके बावजूद वह वेनेजुएला को सैनिक सहायता देने से हिचक रहा है।
चीन की स्थिति यह है कि वह एशिया में अपनी सैन्य ताकत का गाहे-बगाहे मुजाहिरा तो करता है, लेकिन वह सुदूर दक्षिणी अमेरिकी या अफ्रीकी महाद्वीप के देशों में ऐसा करने से हिचक रहा है। इसकी वजह यह है कि चीन की नीतियां कम से कम एशिया से बाहर सिर्फ और सिर्फ आर्थिक मुद्दों पर ही टिकी हैं। पारंपरिक भारतीय शब्दावली में कह सकते हैं कि चीन बनिया बन चुका है। यानी उसका पूरा ध्यान आर्थिक लाभ और हानि पर है। फिर ट्रंप काल में अमेरिका से कारोबारी मुद्दे पर उसकी ठनी हुई है। जिसे वह सहज करने की कोशिश में है। इसलिए वह कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता, जिससे ट्रंप नाराज हों और अमेरिका से उसके कारोबारी रिश्तों पर असर पड़े। चीन की पूरी कोशिश अमेरिका से जारी व्यापार युद्ध को खत्म करे और आर्थिक मोर्चे पर अपनी ताकत बढ़ाए। उसकी कोशिश किसी तरह अमेरिका को खुश करने की भी होगी, ताकि वेनेजुएला से वह पहले की तरह तेल का भारी आयात कर सके।
वेनेजुएला के मसले पर रूस की भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। रूस यूक्रेन में फंसा हुआ है। वेनेजुएला से रूस की रणनीतिक संधि तो है, लेकिन उसमें साझा रक्षा का जिक्र नहीं है। फिर रूस के संसाधन, सेना, सैन्य उपकरण आदि यूक्रेन युद्ध में लगे हुए हैं। ऐसे में अगर वह वेनेजुएला का सैन्य सहयोग करता है तो एक तरह से वह अमेरिका के खिलाफ नया मोर्चा खोलना होगा। रूस इस वजह से बचना चाहता है। इसीलिए जब रूसी झंडा लगे पोत को अमेरिकी सेना ने रोका तो रूस ने सिर्फ अमेरिका से रूसी नागरिकों की हिफाजत और उन्हें छोड़ने की अपील ही की। अतीत में जब सोवियत संघ था, तब अमेरिका ऐसी हिम्मत ही नहीं करता था और अगर करता भी तो सोवियत सेनाएं उस ओर कूच कर सकती थीं।
जाहिर है कि लगातार अर्थकेंद्रित होती दुनिया में देशों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। किसी मसले को सुलझाने के लिए सैन्य कार्रवाई अब आखिरी विकल्प के तौर पर उभरी है। रूस और चीन इसी मानस से ग्रस्त हैं। इसीलिए वेनेजुएला ही नहीं, ऐसे अपने किसी और साथी के सहयोग के लिए सक्रिय रूप से सामने आने में अब उनकी दिलचस्पी नहीं है। ऐसे में दुनिया, विशेषकर अमेरिकी कोप से आशंकित देशों को चिंतित होने की जरूरत है। उन्हें वैकल्पिक राह भी तलाशनी होगी।

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