अमेरिका- यूरोप में टकराव
-इरविन खन्ना
संपादकीय { गहरी खोज }: ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका व यूरोप के बीच टकराव अब खुली चेतावनी तक पहुंच गया है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसन ने दो टूक कहा है कि यदि अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जा किया तो इसका सीधा अर्थ नाटो सैन्य गठबंधन का अंत होगा। उनका यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस ताजा एलान के बाद आया है, जिसमें उन्होंने रणनीतिक व खनिज संपदा से भरपूर आर्कटिक द्वीप को अगले 20 दिनों के भीतर अमेरिकी नियंत्रण में लेने की बात कही है।
फ्रेडरिकसन के बयान के बाद यूरोपीय नेताओं ने खुलकर डेनमार्क और ग्रीनलैंड का समर्थन किया और अमेरिकी दबाव की आलोचना की। हालांकि व्हाइट हाउस के डिप्टी चीफ आफ स्टाफ स्टीफन मिलर ने साफ किया कि ग्रीनलैंड का अमेरिका के पास होना ‘रणनीतिक सुरक्षा’ के लिए जरूरी है। उन्होंने कहा कि आप अंतरराष्ट्रीय शिष्टाचार व बाकी तमाम बातों पर जितनी चाहें चर्चा कर सकते हैं, लेकिन हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जो ताकत से संचालित होती है, जो बल से संचालित होती है और जो शक्ति द्वारा नियंत्रित होती है। वेनेजुएला में हाल ही में किए अमेरिकी सैन्य अभियान के बाद ट्रंप की वैश्विक मंशा और स्पष्ट हो गई है। निकोलस मादुरो को असाधारण सैन्य कार्रवाई में अमेरिका लाए जाने के बाद यूरोप में यह आशंका गहराई कि ग्रीनलैंड अगला निशाना हो सकता है। प्रेडरिकसन व ग्रीनलैंड के पीएम जेंस फ्रेडरिक नील्सन ने ट्रंप की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए गंभीर परिणामों की चेतावनी दी।
डेनमार्क के सरकारी चैनल टीवी 2 से बातचीत में फ्रेडरिकसन ने कहा, ‘अगर अमेरिका किसी दूसरे नाटो देश पर हमला करता है तो सब कुछ रुक जाएगा। इसमें नाटो का अंत भी शामिल है।’
ट्रंप की हड़बड़ी ने पूरे यूरोप में हलचल पैदा कर दी है। फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और ब्रिटेन समेत कई देशों ने ग्रीनलैंड की संप्रभुता का समर्थन किया है। यूरोपीय नेताओं ने साझा बयान में कहा कि ग्रीनलैंड का भविष्य डेनमार्क और वहां के लोगों को तय करने देना चाहिए। नाटो ने भी स्पष्ट किया है कि आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा उसकी प्राथमिकता है। कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने डेनमार्क, ग्रीनलैंड के प्रति अपना समर्थन दोहराया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो नीति अपनाई है वह एक दादागिरी की मिसाल है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला पर किया हमला और वहां के राष्ट्रपति मादुरो व उसकी पत्नी का जिस तरह अपहरण किया गया है, वह सारे विश्व में चर्चा का विषय बना हुआ है। ट्रंप के इस कदम का अमेरिका के भीतर भी विरोध हो रहा है। वेनेजुएला के बाद ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात एक तरह विश्व युद्ध की और बढ़ता कदम ही माना जाएगा। ट्रंप की भारत प्रति टैरिफ बढ़ाने की घोषणा करना और यह कहना की भारतीय प्रधानमंत्री मोदी को मुझे खुश करना चाहिए दर्शाता है कि वह अहमग्रस्त और सनकी तबीयत के इंसान हैं। भारत न तो वेनेजुएला है और न ही ग्रीनफील्ड। भारत विश्व में उभरती आर्थिक व सैन्य शक्ति है। इस बात को अमेरिका अगर नजरअंदाज करता है तो अंजाम भी उसे भुगतना पड़ेगा।
140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश के साथ टकराव की नीति अमेरिका को ही देर सवेर नुकसान पहुंचाएंगी। भारत अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए धैर्य से काम ले रहा है। अमेरिका द्वारा पहले लगाए 50 प्रतिशत टैरिफ की मार झेल रहे भारत पर दबाव बनाने के ट्रंप के प्रयास सफल होने वाले नहीं। संवाद द्वारा व एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए आपसी समझौते होने चाहिए। अमेरिका द्वारा जारी यह ब्यान कि यह दुनिया ताकत से ही संचालित होती है, से सहमत होते हुए यह कहना चाहेंगे कि अमेरिका भारत की ताकत को भी कम आंक कर न देंखे अगर ऐसा करता है तो यह अमेरिका की एक बड़ी गलती होगी।
अमेरीका का चीन व रूस के साथ पहले ही टकराव चल रहा है। यूरोप और भारत के साथ अगर टकराव बढ़ता है तो यह अमेरिका वासियों के लिए लम्बे समय तक नुकसानदेय होगा। ट्रंप तो तीन वर्षों के बाद राष्ट्रपति नहीं होंगे पर, अमेरिका के लिए अवश्य खाई खोद जाएंगे।
