इऩके डर को कौन दूर करेगा,यह भी बड़ा सवाल तो है
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: अभी कुछ हुआ नहीं है लेकिन बाद में हो सकता है।आदमी सोच विचार कर सकता है, वह सोचता है,विचार करता है तो उसमें डर पैदा होना स्वाभाविक है,आशंका पैदा होना स्वाभाविक है।उनका डर एक बड़ा सवाल तो है। इसका जवाब कौन देगा। उनके इस डर को कौन दूर सकता है।कई लोगों को यह डर अस्वाभाविक लग भी सकता है, वह कह सकते हैं कि उनको डरने की क्या जरूरत है।ऐसे में तो कई लोगों के सामने रोजी-रोटी की समस्या भी पैदा हो सकती है, कई लोगों की नौकरी जा सकती है।सवाल यह भी है कि लोगों को यह डर पैदा हुआ है तो क्यों हुआ है, कैसे हुआ है, बड़ा सवाल यह भी है कि उनके डर को दूर कैसे किया जा सकता है।
कांकेर जिला आदिवासी बहुल जिला है।इन दिनों इस जिले में मतांतरण को लेकर लोगों में भारी असंतोष है, भारी नाराजगी है। इससे मतांतरित व आदिवासी लोगों में दूरी बढ़ती जा रही है।कहीं कहीं से हिंसा की घटनाएं भी हुई हैं। उनके बीच तनाव भी बढ़ा है। आदिवासी परिवारों में मतांतरित लोगों को लेकर आशंका बनी हुई है कि यह लोग हमारे बीच रहेंगे तो और लोगों को मतांतरित करेंगे।यह आशंका इन बढ़ी हुई है।इसका परिणाम यह हुआ है कि भानप्रतापपुर ब्लाक के ग्राम परवी में ग्राम सभा आयोजित कर मतांतरित आंगनबाड़ी सहायिका व मितानिन को हटाने का प्रस्ताव पारित किया गया है।इसकी जानकारी कलेक्टर को भेज दी गई है और कहा गया है कि मतांतरित आंगनबाड़ी सहायिका व मितानिन को एक सप्ताह के भीतर पद से हटाया जाए।यही नहीं लोगों का यह भी कहना है कि मतांतरण के बाद भी गोंड परिवार द्वारा आरक्षण सहित शासकीय सुविधाओं का लाभ लिया जारहा है।यह बंद किया जाना चाहिए।
ग्राम परवी के सरपंच राजेंद्र ध्रुव ने कहा है कि अगर पंचायत के प्रस्ताव के बाद एक सप्ताह के भीतर यदि आंगनबाड़ी सहायिका व मितानिन को हटाया नहीं गया तो वह अपने बच्चे आंगनबाडी भेजना बंद कर देंगे।ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र में इस तरह का यह पहला मामला है। इससे पहले नरहरपुर ब्लाक के ग्राम पंचायत रिसवाड़ा के आश्रित ग्राम भैंसमुड़ी,पुसागांव में भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व मितानिन को हटाने का मांग की जा चुकी है।भैंसमुडी़ पंचायत में भी पिछले माह इनको हटाने का प्रस्ताव पारित किया जा चुका है। इस पर प्रशासन ने कोई पहल नहीं की है।मतांतरित आगंनबाडी़ सहायिका व मितानिन को लेकर ग्रामीणों में आशंका है कि मतांतरित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता,सहायिका व मितानिन बहकाकर उनके बच्चों को मतांतरित करवा सकती है।
ग्राम पंचायत में परवी में पहले कोई मतांतरित परिवार नहीं था अब यहां सात परिवार मतांतरित हो चुके हैं।कुछ दस साल से मतांतरित हैं तो कुछ चार पांच साल में मतांतरित हुए हैं।इससे साफ है कि गांव में मतांतरित परिवारों की संख्या बढ़ी तो है। यानी ग्रामीणों में यह आशंका है कि यह लोग आंगनबाड़ी सहायिका, मितानिन बनी रहेंगी तो उनके बच्चों को बहका कर मतांतरित करवा सकती हैं।वह यह महसूस कर रहे हैं कि इस तरह गांव में मतांतरित लोगो के किसी पद पर रहने से उनकी आदिवासी संस्कृति खतरे में है तो वह कुछ गलत नहीं कह रहे है, गलत नहीं सोच रहे हैं।हर समाज के लोगों को अपनी संस्कृति से प्यार होता है, वह उसकी रक्षा करना चाहते हैं तो वह उनका अधिकार है।वह ऐसे लोगों का विरोध करते हैं जो उनकी संस्कृति के लिए खतरा है तो यह भी उनका अधिकार है।
आदिवासी समाज के लोगों ने कलेक्टर से मतांतरित लोगोंं को आंगनबाड़ी सहायिका व मितानिन पद से हटाने की मांग की है तो यह अच्छी बात है क्योंकि यह लोकतांत्रिक रास्ता है, यह शांतिपूर्वक किसी समस्या का समाधान निकालने का प्रयास है। यहां मतांतरित लोगों से कोई मारपीट व हिंसा नहीं की जा रही है। जिला प्रशासन को समस्या बता दी गई है और समाधान निकालने की मांग की गई है। कमिश्नर बस्तर संभाग का कहना है कि यह कलेक्टर के अधिकार क्षेत्र का मा्मला है वह अपने स्तर पर नियमानुसार निर्णय ले सकते है।कलेक्टर ने अभी कोई निर्णय नहीं लिया है, वह क्या निर्णय लेते हैं इस पर सभी की नजर है क्योंकि इससे साफ होगा कि एक गांव के ग्रामीणों की समस्या का समाधान कलेक्टर कर सकते हैं या नहीं कर सकते।
