परिवारवाद का एक परिणाम यह भी है
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: हमारे देश की राजनीति में परिवारवाद सबसे बड़ी व सबसे गंभीर समस्या है लेकिन ज्यादातर राजनीतिक दल इसे न तो सबसे बड़ी समस्या मानते हैं और न ही गंभीर समस्या मानते हैं। उनके लिए राजनीति में परिवारवाद उनका आधिकार है, उसी तरह का अधिकार है जैसे राजा के बेटे का राजा बनना अधिकार होता था। पिता ने एक राजनीतिक दल बनाया है तो पिता के बाद उस राजनीतिक दल पर बेटे का अधिकार परंपरा से माना जाता है और जनता भी उसे कई जगह मानती है। जनता की सोच रहती है कि परिवार ने हमारे लिए बहुत कुछ किया है, इसलिए वह पिता की सेवा को याद कर पुत्र को जिता देती है।
जनता को किसी किसी क्षेत्र में परिवारवाद के फायदे दिखते हैं, उसे यह नहीं दिखता है कि परिवारवाद के कारण राज्य की राजनीति व देश की राजनीति को कितना नुकसान हो रहा है।वह सोच नहीं पाती है कि पार्टी जब किसी परिवार की होती है तो उसमें सही हो या गलत हो फैसला परिवार ही करता है।यानी पार्टी लोकतंत्र की होती है लेकिन वह चलती है तानाशाही से यानी परिवार जैसा चाहेगा पार्टी वैसे ही चलेगी। राजनीति में परिवार के लोगों को ही ज्यादा मौका मिलेगा, ज्यादा पद मिलेंगे, ज्यादा टिकट दिए जाएंगे, परिवार के लोग ही ज्यादा जीतेंगे। यानी परिवार की पार्टी है तो राजनीति में नए लोगों के आने का मौका कम, आगे बढ़ने का मौका कम।
राजनीति में परिवारवाद का एक नुकसान यह भी होता है। परिवार की पार्टी सत्ता में है तो सरकारी काम व सरकारी ठेके भी परिवार के लोगों को दिए जाते हैंं। परिवार की पार्टी चुनाव जीतती है तो सरकार भी परिवार की होती है।सरकार भी परिवार की है तो परिवार के लोगों को लगता है कि हमको सरकारी ठेका या काम प्राथमिकता के आधार पर मिलना चाहिए। परिवारविरोधी परिवार को प्राथमिकता देने को भ्रष्टाचार मानते हैं। यही हुआ है अरुणाचल प्रदेश में।अरुणाचल के सीएम पेमा खांडू पर एक एनजीओ ने आराेप लगाया है कि सीएम के परिजनों से जुड़ी कंपनियों करोड़ों के ठेके दिए गए है्ं।सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जांच के आदेश दे दिए हैं।राज्य सरकार के हलफनामे में स्वीकार किया गया है कि पिछले दस सालों में२१०७९ कायों में से केवल १२१ ठेके ४ कंपनियों को दिए गए है जो सीएम के परिजनों से जुड़ी बताई जा रही हैं।
अरुणाचल सरकार मान रही है और बता रही है कि कायदे से सीएम के परिजनों से जुड़ी कंपनियों को जो ठेके दिए गए हैं वह तो बहुत ही कम है और यह सच भी है। बड़े राज्यों से तुलना की जाए तो सीएम के परिजनों व समर्थकों को इससे ज्यादा ठेके दिए गए होंगे यानी इससे कई गुना ज्यादा इस तरह का भ्रष्टाचार तो ज्यादातर राजनीतिक दलों के समय हुआ है और होता रहा है और होता रहेगा।सिध्दांत के तौर पर यह कहना,सुनना व पढ़ना अच्छा लगता है कि राज्य सरकार सार्वजनिक संसाधनों की मालिक नहीं,जनता की ओर से ट्रस्टी होती है।ठेके व संसाधनो का आवंटन निष्पक्ष होना चाहिए। कोर्ट को न दिखाई दे लेकिन जनता तो रोज अखबार में पढ़ती है कि ज्यादातर राज्य सरकारों में ठेका कैसे दिया जाता है। किसको दिया जाता है और क्यों दिया जाता है। जनता यह भी जानती है कि यह लाइलाज बीमारी है और हर क्षेत्र इससे कम-ज्यादा प्रभावित है।
